Sunday, 12 November 2017

13 नवम्बर - जन्मदिवस, सदा अपराजेय रहे कश्मीर विजयी राजा रणजीत सिंह जी

13 नवम्बर - जन्मदिवस, सदा अपराजेय रहे कश्मीर विजयी राजा रणजीत सिंह जी


पंजाब के लोक जीवन और लोक कथाओं में महाराजा रणजीत सिंह से सम्बन्धित अनेक कथाएं कही व सुनी जाती है. इसमें से अधिकांश कहानियां उनकी उदारता, न्यायप्रियता और सभी धर्मो के प्रति सम्मान को लेकर प्रचलित है. उन्हें अपने जीवन में प्रजा का भरपूर प्यार मिला. अपने जीवन काल में ही वे अनेक लोक गाथाओं और जनश्रुतियो का केंद्र बन गये थे. महाराजा रणजीत सिंह का नाम भारतीय इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। पंजाब के इस महावीर नें अपने साहस और वीरता के दम पर कई भीषण युद्ध जीते थे। रणजीत सिंह के पिता सुकरचकिया मिसल के मुखिया थे। बचपन में रणजीत सिंह चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो गये थे, उसी कारण उनकी बायीं आँख दृष्टिहीन हो गयी थी।

किशोरावस्था से ही चुनौतीयों का सामना करते आये रणजीत सिंह जब केवल 12 वर्ष के थे तब उनके पिताजी की मृत्यु (वर्ष 1792) हो गयी थी। खेलने -कूदने कीउम्र में ही नन्हें रणजीत सिंह को मिसल का सरदार बना दिया गया था, और उस ज़िम्मेदारी को उन्होने बखूबी निभाया। महाराजा रणजीत सिंह ने देश के मंदिरों को दान दिया. उन उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी) के कलश को 22 मन सोना देकर उसे स्वर्ण मंडित किया और अमृतसर के हरिमंदिर पर सोना चढ़वाकर उसे स्वर्ण मंदिर में बदल दिया.

महाराजा रणजीत सिंह स्वभाव से अत्यंत सरल व्यक्ति थे। महाराजा की उपाधि प्राप्त कर लेने के बाद भी रणजीत सिंह अपने दरबारियों के साथ भूमि पर बिराजमान होते थे। वह अपने उदार स्वभाव, न्यायप्रियता ओर समस्त धर्मों के प्रति समानता रखने की उच्च भावना के लिए प्रसिद्द थे। अपनी प्रजा के दुखों और तकलीफों को दूर करन  के लिए वह हमेशा कार्यरत रहते थे। अपनी प्रजा की आर्थिक समृद्धि और उनकी रक्षा करना ही मानो उनका धर्म था। महाराजा रणजीत सिंह ने सन 1801 में बैसाखी के दिन लाहौर में बाबा साहब बेदी के हाथों माथे पर तिलक लगवाकर अपने आपको एक स्वतंत्र भारतीय शासक के रूप में प्रतिष्ठत किया. 40 वर्ष के अपने शासनकाल में महाराज रणजीत सिंह ने इस स्वतंत्र राज्य की सीमाओं को और विस्तृत किया. साथ ही साथ उसमे ऐसी शक्ति भरी की किसी भी आक्रमणकारी की इस ओर आने की हिम्मत नहीं हुई.  

महाराजा रणजीत सिंह नें लगभग 40 वर्ष शासन किया। अपने राज्य को उन्होने इस कदर शक्तिशाली और समृद्ध बनाया था कि उनके जीते जी किसी आक्रमणकारी सेना की उनके साम्राज्य की और आँख उठा नें की हिम्मत नहीं होती थी। महाराजा के रूप में उनका राजतिलक तो हुआ किन्तु वे राज सिंहासन पर कभी नहीं बैठे. अपने दरबारियों के साथ मनसद के सहारे जमीन पर बैठना उन्हें ज्यादा पसंद था. 21 वर्ष की उम्र में ही रणजीत सिंह 'महाराजा' की उपाधि से विभूषित हुए. कालांतर में वे 'शेर – ए – पंजाब' के नाम से विख्यात हुए. महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में किसी को मृत्युदंड नहीं दिया गया, यह तथ्य अपने आप में कम आश्चर्यजनक नहीं है. उस युग में जब शक्ति के मद में चूर शासकगण बात बात में अपने विरोधियो को मौत के घाट उतार देते थे, रणजीत सिंह ने सदैव अपने विरोधियो के प्रति उदारता और दया का दृष्टिकोण रखा. जिस किसी राज्य या नवाब का राज्य जीत कर उन्होंने अपने राज्य में मिलाया उसे जीवनयापन के लिए कोई न कोई जागीर निश्चित रूप से दे दी. 

1798 ई. – 1799 ई में अफगानिस्तान के शासक जमानशाह ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया और बड़ी आसानी से उस पर अधिकार कर लिया पर अपने सौतेले भाई महमूद के विरोध के कारण जमानशाह को वापस काबुल लौट जाना ना पड़ा था| काबूल लौटते समय उसकी कुछ तोपें झेलम नदी में गिर पड़ी थीं| रणजीत सिंह ने इन तोपों को नदी से निकलवा कर सुरक्षित काबुल भिजवा दिया | इस बात पर जमानशाह बहुत प्रसन्न हो गये और उन्होने रणजीत सिंह को लाहौर पर अधिकार कर लेने की अनुमति दे दी | इस के बाद तुरंत ही रणजीत सिंह ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया और 7 जुलाई 1799 के दिन लाहौर पर आधिपत्य जमा लिया | 
उस समय मुल्तान के शासक मुजफ्फरखा थे उन्होने सिख सेना का वीरतापूर्ण सामना किया था पर अंत में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। महाराजा रणजीत सिंह की और से वह युद्ध मिश्र दीवानचंद और खड्गसिंह नें लड़ा था और मुल्तान पर विजय प्राप्त की थी। इस तरह महाराजा रणजीत सिंह नें ई॰ 1818 में मुल्तान को अपने आधीन कर 
लिया। वर्ष 1813 में महाराजा रणजीत सिंह ने कूटनीति द्वारा काम लेते हुए कटक राज्य पर भी अधिकार कर लिया था | ऐसा कहा जाता है की उन्होंने कटक राज्य के गर्वनर जहादांद को एक लाख रूपये की राशि भेंट दे कर ई॰ 1813 में कटक पर अधिकार प्राप्त कर लिया था| 

महाराजा रणजीत सिंह नें 1819 ई. में मिश्र दीवानचंद के नेतृत्व मे विशाल सेना कश्मीर की और आक्रमण करने भेजी थी। उस समय कश्मीर में अफगान शासक जब्बार खां का आधिपत्य था। उन्होनें रणजीत सिंह की भेजी हुई सिख सेना का पुरज़ोर मुकाबला किया परन्तु उन्हे पराजय का स्वाद ही चखना पड़ा। अब कश्मीर पर भी रणजीत सिंह का  पूर्ण अधिकार हो गया था। आगे बढ़ते हुए ई॰ 1820-21 में महाराजा रणजीत सिंह ने क्रमवार डेरागाजी खा, इस्माइलखा और बन्नू पर विजय हासिल कर के अपना अधिकार सिद्ध कर लिया था। पेशावर पर जीत हासिल करने हेतु ई॰ 1823. में महाराजा रणजीत सिंह ने वहाँ एक विशाल सेना भेज दी। उस समय सिक्खों ने वहाँ जहांगीर और नौशहरा की लड़ाइयो में पठानों को करारी हार दी और पेशावर राज्य पर जीत प्राप्त कर ली। महाराजा की अगवाई में ई॰ 1834 में पेशावर को पूर्ण सिक्ख साम्राज्य में सम्मलित कर लिया गया।

भारतीय इतिहास में अपनी जगह बनाने वाले प्रचंड पराक्रमी महाराजा रणजीत सिंह 58 साल की उम्र में सन 1839 में मृत्यु को प्राप्त हुए। उन्होने अपने अंतिम साँसे लाहौर में ली थी। सदियों बाद भी आज उन्हे अपने साहस और पराक्रम के लिए याद किया जाता है। सब से पहली सिख खालसा सेना संगठित करने का श्रेय भी महाराजा रणजीत सिंह को जाता है। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र महराजा खड़क सिंह ने उनकी गद्द्दी संभाली। महाराजा रणजीत सिंह में आदर्श राजा के सभी गुण मौजूद थे- बहादुरी, प्रजा प्रेम, करुणा, सहनशीलता, चातुर्य और न्यायसंगतता। भारत वर्ष के इस महान तेजवंत शासक को आज उनके जन्म दिवस पर हिन्दू परिवार संघठन संस्था   का बारम्बार नमन वंदन और अभिनन्दन ..