Saturday, 27 January 2018

सेकुलर मीडिया अब तक सिर्फ समुदाय विशेष के नाम को रट रही

जब सबके लिए एक ही है देश , तो किस आधार पर "समुदाय विशेष

जब बात समानता की हो , समरूपता की हो तो ये विशेष शब्द कहीं न कहीं सवाल भी खड़े करता है और सन्देह भी पैदा करता है . ये नाम किसने दिए और किस आधार पर दिए इसकी विवेचना जरूर होनी चाहिए क्योंकि जहां VIP कल्चर के नाम पर जनता किसी मंत्री या अधिकारी की गाड़ी पर लाल या नीली बत्ती तक नहीं देखना चाहती वहीं किसी पूरे समुदाय के साथ विशेष शब्द लगाना किस साजिश का संकेत माना जाय ?
कासगंज में हुतात्मा हुए चन्दन की हत्या के बाद उनके सामाजिक जीवन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं ..हैरानी की बात ये है कि करणी सेना के प्रदर्शन को राजपूत का ठप्पा मारने वाली तथाकथित सेकुलर मीडिया अब तक सिर्फ समुदाय विशेष के नाम को रट रही और उनकी रिपोर्टिंग में वो धार नही दिख रही जो उन्होंने राजपूतो के खिलाफ दिखाई थी ..
रिपोर्टिंग का प्रकार देखिए कि सिनेमा घरों में तोड़फोड़ का जाति , मत , मज़हब सब घोषित कुछ पलो में हो गया लेकिन अब तक चन्दन के कातिलों के साथ हत्यारा शब्द भी नही जोड़ा गया है ..इस दोगलेपन का इलाज क्या है ये तो समय के गर्भ में छिपा है लेकिन समुदाय विशेष क्यों व किसे कहा जाता है इसका जवाब अभी बाकी है ...सवाल ये भी है कि चंदन पर कहीं पहले से तो निशाना नहीं था ? क्या उसके सामाजिक कार्य किसी की नजरों में खटक रहे थे ?