Thursday, 4 January 2018

रावण के अंत के बाद जब सीता से मिलने आई थी शूर्पनखा....




रावण का अहंकार,
यूं तो रावण का अहंकार, उसका लालच ही उसके अंत के लिए जिम्मेदार है लेकिन अगर उसकी बहन शूर्पनखा को भी असुर सम्राट के विनाश का कारण कहा जाए तो शायद ही कोई इस बात को नकार पाएगा। शूर्पनखा ही राम-रावण युद्ध का मुख्य कारण थी।

राम-रावण युद्ध
यूं तो राम-रावण युद्ध से संबंधित घटनाओं से जुड़ी बहुत सी कहानियां हम कई बार सुन चुके हैं और जाहिर तौर पर आगे भी सुनते रहेंगे लेकिन एक कहानी ऐसी है जिसे शायद ही कोई जानता होगा। यह कहानी है सीता और शूर्पनखा की उस खास मुलाकात की।


सीता का त्याग
जब भगवान श्रीराम ने लोक-लाज के कारण अपनी पत्नी सीता का त्याग कर दिया था तब वह एक जंगल में वास करनेचली गई थीं। इसी जंगल में शूर्पनखा, सीता से मिलने आई थी। क्या हुआ था इस मुलाकात के दौरान आइए जानें।

अशोक वाटिका
जो सीता अशोक वाटिका में कैद थी और जो सीता पति के त्याग के बाद जंगल में समय बिता रही थी, उन दोनों में बहुत अंतर था। एक अपने पति पर विश्वास कर उसका इंतजार कर रही थी वहीं ये सीता अपने पति द्वारा त्यागी गई है और एक आश्रम में रहने के लिए मजबूर है।

शूर्पनखा
शूर्पनखा, सीता की इस स्थिति को देखकर बहुत प्रसन्न थी। उसने सीता को ताने मारने शुरू कर दिए, कैसे एक बार राम ने उसे अस्वीकार किया था और कैसे अब श्रीराम ने सीता को त्याग दिया है।


भगवान राम
शूर्पनखा ने सीता को यह भी दिलाना शुरू किया कि कैसे उनके पति भगवान राम ने उसका असम्मान किया था। शूर्पनखा ने सीता से कहा कि आज उनकी यह स्थिति देखकर वह बहुत खुश और संतुष्ट है।

माता सीता
सीता अत्याधिक धैर्य से शूर्पनखा की हर बात सुनते हुए धीमे-धीमे मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने शूर्पनखा से कहा कि उसकी बातें कुछ वैसी ही मीठी हैं जैसे मंदोदरी के बगीचे में बेर थे। सीता के चेहरे पर मुस्कुराहट देखकर शूर्पनखा आग बबूला हो गई। उसने सोचा था सीता रोगी, दर्द महसूस करेगी, लेकिन जो हो रहा था वो कल्पना से परे था।

सीता की नियती
लेकिन सीत ने अपनी नियती को स्वीकार कर लिया था, अब उन्हें किसी प्रकार का दर्द महसूस नहीं होता था। सीता ने शूर्पनखा से बोला “मैं यह कैसे सोच सकती है या ऐसी उम्मीद कैसे लगा सकती हूं कि मैं जिनसे और जितना प्रेम करती हूं, वो भी मुझसे उतना ही प्रेम करें”।

सीता की नियती
सीता ने कहा “हमें अपने भीतर उस शक्ति को जागृत करना चाहिए जो हमें उन लोगों से प्रेम करना सिखाए जो हमसे प्रेम नहीं करते, दूसरों को भोजन देकर अपनी भूख मिटाना ही वास्तविक मनुष्यता है”।

शूर्पनखा
सीता की ये बातें सुनकर शूर्पनखा जोर-जोर से रोने लगी, उसे प्रतिशोध चाहिए था, उन लोगों से जिसने उसका असम्मान किया। उसने सीता से कहा कि मुझे न्याय कैसे मिलेगा? जिन्होंने मेरे सम्मान के साथ खिलवाड़ किया, उन्हें दंड कब मिलेगा।

सम्मान के साथ खिलवाड़
इस सवाल के जवाब में सीता ने कहा जिसने तुम्हारा असम्मान किया था, उन्हें दंड मिल चुका है, जिस दिन दशरथ पुत्रों ने तुम्हारे सम्मान के साथ खिलवाड़ किया था, तब से लेकर अब तक वे चैन की नींद नहीं सो पाए हैं।
प्रतिशोध की भावना
सीता ने शूर्पनखा से कहा कि वो अतीत को भूलकर आए बढ़े, उसे अपने मस्तिष्क को खोलने की आवश्यकता है। अगर वह अपने अतीत से बाहर नहीं आई, प्रतिशोध की भावना को अंदर लिए बैठी रही तो वह भी अपने भाई रावण की तरह बन जाएगी।

प्रकृति
अंत में सीता ने कहा राम और रावण तो आते-जाते रहेंगे, लेकिन प्रकृति स्थिर है। मुझे अब प्रकृति का आनंद लेना चाहिए।

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