Thursday, 1 February 2018

2 फरवरी 1931 को भगत सिंह ने युवा राजनैतिक कार्यकर्ताओं के लिये ये लिखा

2 फ़रवरी- आज ही भगत सिंह ने पत्र लिख कर कहा "मैं आतंकवादी नहीं". सवाल बनता है- "तब कहाँ थे आज़ादी के ठेकेदार" ?




आज़ादी के कुछ नकली ठेकेदारों के बारे में प्रचलित है कि वो सबका बड़ा सम्मान करते थे और उन्होंने भारत में आज़ादी की अलख जगा दी थी लेकिन अगर ये सारे दावे सही थे तो भारत के सर्वोच्च बलिदानी को , एक महानतम क्रांतिवीर को ये पत्र लिख कर खुद की सफाई क्यों देनी पड़ी कि वो एक आज़ादी का योद्धा है न कि आतंकी .. ये पत्र उस वीर को क्यों लिखने पड़े जब तमाम आज़ादी के ठेकेदारों के बारे में कहा जाता है कि वो लाखों लोगों के जुलूस के साथ चला करते थे . कुछ नमक , वस्त्र आदि के लिए आन्दोलन कर डाले थे लेकिन आखिर उन्हें इस वीर के लिए आन्दोलन की जरूरत क्यों नहीं समझ में आई .

2 फरवरी 1931 को भगत सिंह ने युवा राजनैतिक कार्यकर्ताओं के लिये ये लिखा; - कुछ को लगता है मैंने आतंकवादी जैसा काम काम किया है पर मैं मैं अपनी सारी ताकत से ये कहना चाहता हूँ की मैं आतंकवादी नहीं हूँ .. भगत सिंह के ये शब्द उस समय आज़ादी के क्रांतिवीरों की दुर्दशा बताते हैं . ये सिर्फ भगत सिंह के साथ नही था . अमर बलिदानी राम प्रसाद बिस्मिल जी से भी मिलने कोई जेल में नहीं गया . क्रांतिदूत चन्द्रशेखर आज़ाद की अंतिम यात्रा लगभग 5 किलोमीटर तक गयी थी लेकिन उनकी अंतिम यात्रा में आज़ादी के तथाकथित ठेकेदार नहीं दिखे जबकि उनमे से कुछ के घर इलाहाबाद में ही थे .

भगत सिंह की ये लाइन भले ही आज भी आप की छाती को चीरने जैसी वेदना देती है लेकिन सवाल ये है कि उस समय के उन तमाम ठेकेदारों को इन शब्दों से वेदना क्यों नहीं हुई ? आखिर क्या वजह है कि किसी तथाकथित ठेकेदार के पास गिनाने के लिए एक कार्य भी नहीं है जो उन्होंने इन वीरों के लिए किया रहा हो जबकि इन्होने भुने भुने चने खा कर आज़ादी की जंग लड़ी थी . आज भगत सिंह को याद कर के उस चुप्पी पर भी सवाल कीजिए जो इन वीरो को अकेला छोड़ दिया था इनके हाल पर ? भगत सिंह अमर रहें , देश की आज़ादी के असल इतिहास की प्रतीक्षा में ...

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