Tuesday, 20 February 2018

सात फेराें के दौरान लिए सात वचन,

शादी के वक्त क्यों दिए जाते हैं एक-दूसरे को सात वचन, जानिए इनका महत्व




हिंदू धर्म में विवाह काे लेकर कई रस्में हैं, इन रस्माें में सबसे अह्म शादी के वक्त लिए हुए सात फेराें के दौरान लिए सात वचन, जिन्हें पूरी उम्र वर वधु काे निभाने पड़ते हैं। यह वचन अग्नि और ध्रुव तारा को साक्षी मानकर लिए जाते हैं। आप ने शादी की रस्म देखते हुए कई बार ये वचन सुने होगें, लेकिन क्या आप संस्कृत में बोले जाने वाले इन वचनों का व्यवहारिक अर्थ जानते हैं। शायद नहीं, अाज हम अापकाे इनका वचनाें का अर्थ बताएंगे। जाे इस प्रकार हैं-
पहला वचन- तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी !!
अर्थ- इस वचन में कन्या वर से कहती है कि वो कभी भी तीर्थ यात्रा पर जाएं तो मुझे साथ लेकर जाएं। आप कोई भी व्रत और धर्म कार्य करें तो आज ही की तरह अपने साथ मुझे स्थान दें। यदि आप इसे मानते हैं तो मैं आपके साथ जीवन बिताना स्वीकार करती हूं।
दूसरा वचन- पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!
अर्थ- दूसरे वचन में कन्या वर से कहती है कि वो जिस तरह अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं। ठीक उसी तरह मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें। ताकि हमारी गृहस्थी में किसी भी प्रकार का आपसी विवाद ना आ सके। अगर आप मुझे ये वचन देते हैं तो मैं आपके साथ जीवन बिताना स्वीकार करती हूं।

तीसरा वचन- जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात,

वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!
अर्थ- तीसरे वचन में कन्या वर से कहती है कि आप मुझे वचन दें, कि जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा साथ देंगे। अगर आप मुझे साथ देने का वचन देते हैं तो मैं आपके साथ जीवन बिताना स्वीकार करती हूं।
चौथा वचन- कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!
अर्थ- चौथे वचन में कन्या वर से कहती है कि अभी तक आप घर-परिवार की चिंता से पूरी तरह से मुक्त थे, लेकिन अब विवाह के बंधन में बंधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की सभी समस्याओं का दायित्व आपके कंधों पर आएगा। अगर आप इस भार को मेरे साथ उठाने का वचन देते हैं तो मैं आपके साथ जीवन बिताना स्वीकार करती हूं।
पांचवा वचन- स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!
अर्थ- इस वचन में कन्या वर से कहती है कि शादी के बाद अपने घर के कार्यों, लेन-देन और अन्य खर्च करते समय अगर आप मेरी भी सलाह लेंगे तो मैं आपके साथ जीवन बिताना स्वीकार करती हूं।
छठा वचन- न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत,
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम !!
अर्थ- इस वचन में कन्या वर के कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों या अन्य स्त्रियों के बीच बैठूं तो आप वहां किसी भी कारणवश मेरा अपमान नहीं करेंगे। इसके साथ ही यदि आप जुआ या किसी भी बुरे काम से खुद को दूर रखते हैं तो मैं आपके साथ जीवन बिताना स्वीकार करती हूं।
सातवां वचन- परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!
अर्थ- इस आखिरी वचन में कन्या वर से कहती है कि वह पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे और पति-पत्नी के आपसी प्रेम के बीच किसी को भागीदार ना बनाने का वचन देते हैं तो मैं आपके साथ जीवन बिताना स्वीकार करती हूं।