Thursday, 22 February 2018

राजस्थान में एक ऐसा किला है जिसके बारे में इतिहासकार लिखते है कि इस किले के राजा के पास पारस पत्थर था, जिसकी मदद से वह लोहे को स्वर्ण में बदल लिया करता था|

इस किले का राजा पारस पत्थर से लोहे को बदलता था सोने में



राजस्थान में एक ऐसा किला है जिसके बारे में इतिहासकार लिखते है कि इस किले के राजा के पास पारस पत्थर था, जिसकी मदद से वह लोहे को स्वर्ण में बदल लिया करता था| यही कारण था कि यह राजा अपनी प्रजा से कर के रूप में नकद रुपया ना लेकर लोहा लिया करता था और उसे स्वर्ण में बदल लेता था| स्वर्ण को सुरक्षित रखने के लिए किले के गर्भ में अनेकों तलघर बने है, जहाँ स्वर्ण रूपी खजाना रखा जाता था| रियासत के अंतिम चरण में इस किले में खुदाई की गई थी, पर खुदाई में क्या मिला ? इस तथ्य पर आज भी प्रश्नचिन्ह है| हाँ खुदाई में पत्थर के गोल चाक निकले वे आज भी वहीं रखें है|
जी हाँ ! हम बात कर रहे है करौली मुख्यालय से 42 किलोमीटर दूर माँसलपुर तहसील के भोजपुर गांव के पूर्व में सागर की पार पर बने तिमनगढ़ किले की| इस किले को श्रीकृष्ण के वंशज यदुवंशी राजा तिमनपाल ने बनवाया था| सन 1048 में बना यह किला समुद्रतल से 1309 फिट की उंचाई पर बना है| इस किले में सोने के खजाने का इतिहास खंगालने वाले “करौली राज्य का इतिहास” पुस्तक के लेखक दामोदर लाल गर्ग को एक ताम्रपत्र मिला था, जिसमें कुल 15 लाइनें लिखी है, जिसमें महाराजा हरिपाल के शासन में बाला किले के अन्दर खजाना गाड़ने की बात लिखी हुई है|
किले में 80 से ज्यादा प्राचीरें है| मुख्यद्वार को जगनपोल के नाम से जाना जाता है| धन व मूर्तियाँ निकालने के लिए असामाजिक तत्वों द्वारा खंडहर बना दिए इस किले में ननद-भौजाई के जुड़वां कुँए, राजगिरि बाजार, फर्शबंदी की सड़क, तेल कुआँ-चाक, आमखास प्रासाद, मंदिर, घुड़साल व किलेदारों के रहने के आवास बने है| शिल्प का इस किले में भंडार था, जो इस किले को खँडहर में तब्दील होने का कारण बना|
अपने समय इस क्षेत्र का सत्ता का महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा यह किला भी मोहम्मद गौरी की नजर से नहीं बच सका और सन 1196 में गौरी ने इस किले पर अधिकार कर लिया| मुस्लिम इतिहासकार हसन निजामी ने लिखा है- “अब तक संसार के किसी शासक ने इसे नहीं जीता, जिसे हमारे बादशाह ने चारों ओर से घेर लिया| किले का राजा कुंवरपाल जिसे अपनी सेना पर गर्व व दुर्ग की दृढ़ता पर पूर्ण विश्वास था, ने शत्रु की सेना की संख्या देखते हुए आत्मसमर्पण पर मजबूर हुआ और किले पर मुसलमानों का अधिकार हो गया, हालाँकि बाद में उसके वंशजों ने कुछ वर्ष बाद किले पर दुबारा कब्ज़ा कर लिया|
अगले लेख में आपको बताया जायेगा कि राजा तिमनपाल के हाथ पारस पत्थर कैसे आया था|  यहाँ के लोगों का यह भी मानना है कि आज भी क़िले के पास स्थित सागर झील में पारस पत्थर है, जिसके स्पर्श से कोई भी चीज़ सोने की हो सकती है|