Friday, 9 March 2018

मेरु पर्वत को अलौकिक पर्वत की संज्ञा दी गई है और इसे सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा समेत समस्त देवी-देवताओं का स्थान कहा गया है।

मेरु पर्वत के रहस्य से जुड़ा है धरती और देवताओं का रिश्ता


धार्मिक सिद्धांत

विभिन्न धर्मों की अलग-अलग मान्यताओं को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। वैश्विक स्तर पर अलग-अलग धर्मों का अस्तित्व मौजूद है और सभी अपने आप में प्रमुख हैं, जिनके अलग-अलग सिद्धांत एक-दूसरे से काफी हद तक जुड़े हुए हैं। अगर गंभीरता और निष्पक्षता से इन धर्मों का विश्लेषण किया जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि आदर्शों और मान्यताओं में भिन्नता होने के बावजूद भी बहुत कुछ ऐसा है जो इन्हें परस्पर जोड़कर रखे हुए है।

मेरु पर्वत

मेरु पर्वत, एक ऐसा स्थान है, जिसका उल्लेख आपको लगभग सभी प्रमुख धर्मों में मिल जाएगा। यहां तक कि इससे जुड़ी मान्यताएं भी लगभग समान हैं। पौराणिक कहानियों और दस्तावेजों में मेरु पर्वत का जिक्र एक ऐसे पर्वत के तौर पर मिलता है, जो सोने के समान चमकीले सुनहरे रंग का है।

हिन्दू धर्म

हिमालय की गोद में स्थित मेरु पर्वत की विशेषता यही समाप्त नहीं हो जाती, बल्कि इसे ब्रह्मा का निवास स्थान भी माना जाता है। हिन्दू धर्म से जुड़े दस्तावेजों में मेरु पर्वत को अलौकिक पर्वत की संज्ञा दी गई है और इसे सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा समेत समस्त देवी-देवताओं का स्थान कहा गया है।

अलौकिक स्थान

पौराणिक हिन्दू खगोलीय ग्रंथ, सूर्य सिद्धांत के अनुसार मेरु पर्वत पृथ्वी की नाभि पर स्थित है। इसके अलावा यह भी उल्लिखित है कि सुमेरु अर्थात मेरु पर्वत, उत्तरी ध्रुव और कुमेरु पर्वत दक्षिणी ध्रुव पर स्थित है। जिसका अर्थ है कि मेरु पर्वत का आकार उत्तर से दक्षिण ध्रुव तक फैला हुआ है।

धरती पर स्वर्ग

मेरु पर्वत को स्वर्ग की संज्ञा दी जाती है जिसकी संरचना धरती पर होने के बावजूद भी धरती पर नहीं हुई है। पौराणिक कथाओं में मेरु पर्वत के विषय में बहुत कुछ कहा गया है, वरन मत्स्य पुराण और भागवत पुराण में इसकी ऊंचाई 84 हजार योजन बताई गई है जो धरती के कुल व्यास से करीब 85 गुणा है।

कूर्म पुराण

कूर्म पुराण के अनुसार इस नश्वर क्षेत्र के बीचोबीच जंबूद्वीप स्थित है जिसके मध्य में स्थित है सुनहरा मेरु पर्वत। इसकी ऊंचाई 84 हजार योजन, फैलाव 16 हजार योजन, ऊपर की ओर की चौड़ाई 32 हजार और नीचे की चौड़ाई 16 हजार योजन है।

चार द्वारपाल

हम मुख्त: चार दिशाओं से परिचित हैं और हिन्दू धर्म में इन चारों दिशाओं के अलग-अलग द्वारपाल या संरक्षक बताए गए हैं। जैसे कि पूर्वी दिशा का संरक्षण इन्द्र देव के हाथ है, पश्चिमी दिशा की रक्षा वरुण देव करते हैं। दक्षिण दिशा की रक्षा स्वयं मृत्यु के देवता यम द्वारा की जाती है और उत्तरी दिशा के द्वारपाल धनकुबेर हैं।

जैन और बौद्ध धर्म

ये चारों देव मेरु पर्वत को अलग-अलग दिशाओं को एक अभिभावक की तरह देखते हैं। केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं बल्कि जैन और बौद्ध धर्म के लोग भी मेरु पर्वत को स्वर्ग की संज्ञा देते हैं, यहां तक कि प्राचीन यूनानी कथाओं में मेरु को ऑलिम्पस पर्वत का नाम दिया गया है।

रहस्य

जावा (इंडोनेशिया) में प्रचलित लोक कथाओं में भी मेरु पर्वत का जिक्र देवताओं के पौराणिक निवास के रूप में किया गया है। पंद्रहवी शताब्दी से संबंधित कवि भाषा में लिखी गई प्राचीन पांडुलिपियों में जावा द्वीप के उद्भव और मेरु पर्वत के कुछ हिस्सों को जावा द्वीप से क्यों जोड़ा गया, इसका रहस्य बताया गया है।

जावा

जावा की इस प्राचीन पांडुलिपि के अनुसार बतारा गुरु (शिव) ने विष्णु और ब्रह्मा को यह आदेश दिया कि वह इस द्वीप पर मानवता को जन्म दें, समस्त द्वीप को मनुष्यों से भर दें। उस समय जावा द्वीप हर समय हिलता और सागर पर बहता रहता था।

महामेरु पर्वत

ऐसे हालात में मनुष्यों का वहां रहना कठिन था इसलिए द्वीप को स्थिर रखने के लिए ब्रह्मा और विष्णु ने महामेरु पर्वत के भाग को जांबूद्वीप पर ले जाकर उसे जावा द्वीप से जोड़ने का निश्चय किया। इसके परिणाम के तौर पर जावा के सबसे लंबे पर्वत, सुमेरु पर्वत की स्थापना हुई।

सैंटा क्लॉज

ईसाई धर्म में सैंटा क्लॉज की अवधारणा बहुत प्रचलित है जो क्रिसमस के दिन धरती पर उतरता है। सैंटा क्लॉज का धरती पर आगमन भी उत्तरी ध्रुव यानि मेरु या ऑलिम्पस पर्वत की ओर से ही होता है।

जापानी कथा

जापानी और चीनी पौराणिक कथाओं में ईश्वर का स्थान ध्रुव तारे के ठीक नीचे और धरती के बिल्कुल मध्य में होता है। मेरु पर्वत भी धरती के बीचोबीच ही स्थित है।

स्वर्ग से धरती का संबंध

नॉर्स पौराणिक कथाओं में अनश्वरों की धरती उत्तरी ध्रुव पर स्थित है, जहां नर्क, स्वर्ग और धरती एक-दूसरे से जुड़ते हैं। मेरु पर्वत का स्थान यही है। केल्ट पौराणिक कथाओं में भी स्वर्ग का जिक्र एक ऐसे स्थान के रूप में किया गया है जहां साल के छ: महीने लगातार बर्फ गिरती है। यह भी ध्रुवीय स्थिति को ही दर्शाता है।

मंदिरों की संरचना

ऐसा कहा जाता है आदिकाल में मेरु पर्वत से जुड़ी अवधारणा इतनी पुख्ता और मजबूत थी कि कई बेहद प्राचीन मंदिरों का निर्माण भी इस पर्वत की संरचना की तरह ही हुआ है। हिन्दू, जैन और बौद्ध मंदिर इस बात के सशक्त उदाहरण हैं।

ब्रह्मलोक

मेरु पर्वत को ना सिर्फ ब्रह्मा का स्थान कहा गया है बल्कि अन्य पौराणिक चरित्रों के साथ भी इसके संबंध को बताया गया है। जैसे कि मेरु पर्वत के सबसे ऊपर ब्रह्मलोक अर्थात ब्रह्मा का स्थान है और इसके अलग-अलग तल पर विभिन्न देवी-देवता रहते हैं।

अन्य पात्र

मेरु पर्वत की चोटी पर 33 देवताओं का निवास स्थान है। यहां इन्द्र देव भी रहते हैं। इसकी हर ढलान पर इस पर्वत के चार अभिभावक यम, कुबेर, इन्द्र और वरुण देव रहते हैं।

असुरों का वास

इसके नीचे अन्य पौराणिक पात्र जैसे अप्सरा, गंधर्व, यक्ष, नाग, सिद्ध, विद्यधर रहते हैं। सबसे नीचे असुरों का वास है।
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