Sunday, 11 March 2018

मनुस्मृति में इसका जिक्र एक श्लोक के माध्यम से किया गया है

इन 8 लोगों से कभी ना करें मुकाबला, हमेशा होगी हार

जीवन जीने का सबसे सरल और आदर्श तरीका क्या है, इसे कोई भी नहीं कह सकता। अलग-अलग परिस्थितियों और लोगों के साथ यह अलग-अलग हो सकता है, एक ही चीज और काम अलग-अलग हालातों में सही या गलत हो सकते हैं। पर कैसे जानें कि कब क्या सही है और क्या गलत? इसी उहापोह में कई बार ऐसे काम भी कर जाते हैं जिसके लिए बाद में पछताते हैं। उस वक्त आपको सबसे बड़ा दुख इस बात का होता है कि काश, यह बात पहले समझ आ जाती!
हालांकि जीवन एक अनंत बढ़ती नदी की तरह है जिसकी राह में कुछ भी आए, वह बढ़ती रहती है। नदी को जिधर रास्ता मिल जाए, वह उसी ओर बह जाती है, लेकिन अपनी गति और अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए इसके कुछ रास्ते पहले से तय होते हैं। समय-समय पर अचानक आए कुछ बदलावों, राह की बड़ी परेशानियों के साथ यह अपने मार्ग में कई बार बदलाव भी करती है, लेकिन उसकी पहचान अपने पूर्व-प्रशस्त मार्ग से ही होती है।



जीवन भी बहुत हद तक इस नदी की तरह ही है, अगले पल सब कुछ सामान्य रह सकता है लेकिन यह भी संभव है कि कुछ ऐसा हो जाए जो आपके जीने की दिशा ही बदल दे। जिस प्रकार नदी अपनी राह में आने वाले छोटे कंक्रीट और पत्थरों के लिए हमेशा तैयार रहती है, उसी प्रकार जीवन में कुछ समान्य बाधाओं के लिए हमेशा सचेत रहना चाहिए। पर नदी को पता है कि बड़े पत्थर और पहाड़ों के सामने आने से उसे अपना रास्ता बदल लेना है। इस प्रकार उसका अस्तित्व अपनी पहचान के साथ बना रहता है लेकिन अगर वह ऐसा नहीं करती है तो शाखाओं में बंटकर अपनी पहचान खो सकती है।
इसी प्रकार जीवन में कुछ ऐसी बाधाएं और और कुछ ऐसे नियम हैं जिनके लिए मनुष्य को हमेशा सचेत रहना चाहिए। इन बाधाओं के प्रति अपना एक निर्धारित रुख अपनाते हुए तथा नियमों का ईमानदारी पूर्वक पालन करते हुए आप बेवजह की परेशानियों में उलझकर अपनी पहचान खोने से बच सकते हैं। इसी संदर्भ में मनुस्मृति में राह चलते हुए 8 खास जातकों की चर्चा की गयी है जिनके लिए आपको सदैव ही अपना मार्ग छोड़ देना चाहिए या कहें रास्ता पार करने के लिए उन्हें वरीयता देते हुए पहले उनके गुजरने का इंतजार करें, तभी स्वयं आगे बढ़ें। मनुस्मृति में इसका जिक्र एक श्लोक के माध्यम से किया गया है जो इस प्रकार है - “चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः। स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च।।
अर्थात् मार्ग में चलते हुए अगर आपके सामने रथ पर सवार व्यक्ति, रोगी, स्त्री, वृद्ध, बोझ उठाये व्यक्ति, स्नातक (ज्ञानी), राजा और वर आएं, तो हमेशा ही उसे मार्ग दे देना चाहिए। ऐसा ना करना स्वयं के जीवन के लिए परेशानियां खड़ी करने के समान है। पर इसकी एक खास वजह है, आगे हम क्रमवार इसकी चर्चा कर रहे हैं....
रथ: रथ हमेशा आपसे ऊंचा होगा। अगर उसपर सारथी हुआ तो संभव है कि वह रुककर आपको रास्ता दे दे, लेकिन अगर उसपर राजा समान व्यक्ति हुआ या घोड़ा लगाम से बाहर हुआ तो वह आपके लिए नहीं रुकेगा और आपका जीवन खतरे में पड़ सकता है। हालांकि आज के संदर्भ में बात करें तो रथ की तुलना कार और बस से की जा सकती है और घोड़ों की जगह ब्रेक को समझा जा सकता है। साफ शब्दों में आज के परिपेक्ष्य में अगर माना जाए, तो राह चलते हुए वाहनों को रोककर आगे बढ़ना शास्त्र-सम्मत भी नहीं है, इसलिए ऐसा करने से बचें।
वृद्ध: बड़े-बुजुर्ग हमेशा ही सम्माननीय माने गए हैं, इसलिए चाहे आप कितनी भी जल्दी में हों लेकिन अगर आपके सामने कोई वृद्द्ध महिला-पुरुष आ जाएं तो आप रुककर उन्हें अवश्य ही मार्ग दें या आगे बढ़ने के लिए उन्हें रास्ता दें। शास्त्रों में जहां बड़ों का सम्मान ना करने वाला ‘हेय (तुच्छ)’ मनुष्य माना गया है, वहीं ज्योतिष शास्त्र में इसे सूर्य को कमजोर करने का कारक माना गया है जो मनुष्य को अवनति की ओर धकेलता है। ऐसा व्यक्ति कभी भी सम्मानजनक और खुशहाल जीवन नहीं जी पाता।
रोगी: राह में किसी भी प्रकार का बीमार व्यक्ति मिले, उसे मार्ग अवश्य देना चाहिए। आपको नहीं पता कि उसके रोग की अवस्था क्या है। हो सकता है कि वह इतना अधिक बीमार हो कि थोड़ी भी देर होने पर उसकी जान पर बन आए। ऐसे में आप पाप के भागीदार होंगे।
बोझ उठाए व्यक्ति: मानवता हर मनुष्य का पहला धर्म और प्रथम कर्त्तव्य है। शरीर पर बोझ उठाकर चल रहा व्यक्ति आपकी अपेक्षा अधिक कष्ट में होगा, इसलिए उसे राह देकर उसे गंतव्य तक पहुंचने में आप उसकी मदद करते हैं। यही आपका नैतिक धर्म भी है और इंसानियत भी, यही शास्त्र सम्मत भी है। ऐसा ना करके कहीं ना कहीं आप इंसानियत के धर्म को अनदेखा कर शास्त्रों की भी अवहेलना कर रहे हैं जो आपको पाप और कष्ट पाने का भागीदार बनाता है।
स्त्री: हिंदू शास्त्रों में स्त्रियों को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है, इसलिए जिस भी प्रकार से हो इनका सम्मान करना आपको हमेशा ही मां लक्ष्मी के साथ ही सरस्वती की कृपा का पात्र भी बनाता है। ऐसे मनुष्य जीवन में हर खुशी पाते हैं, साथ ही धन-वैभव समेत हर वो चीज पाते हैं जिसकी उन्हें चाह होती है। इसलिए जब भी कोई स्त्री दिखे तो उसे सम्मान देते हुए हमेशा ही उसे रास्ता पहले पार करने दें।
स्नातक (ज्ञानी): यहां ‘स्नातक’ से अर्थ ज्ञानी या विद्वान पुरुष या स्त्रियों से हैं। ज्ञान ही मनुष्यता और धर्म का भाव लाता है, अत: जो ज्ञानी है वह हमेशा ही सम्माननीय है। इसलिए जब भी रास्ते में चलते हुए आपके सम्मुख कोई ज्ञानी पुरुष या महिला आए तो उसे सम्मान देते हुए हमेशा ही उनका मार्ग छोड़कर पीछे हट जाएं। इससे उनका आशीर्वाद आपको मिलेगा और हो सकता है भविष्य में अपने ज्ञान के प्रकाश से वो आपकी सफलता की राहें भी आपको दिखा दें।
राजा: हालांकि आज के संदर्भ में यह राजनेता हो सकते हैं, किंतु यहां ‘राजा’ से संदर्भ है ‘आपका पालन-पोषण करने वाला’। वह नीति-निर्माता और नीति-निर्देशक भी होता है, इसलिए एक प्रकार से वही आपके जीवन की डोर होता है। उसके बिना आप एक अच्छा जीवन जीने की आप नहीं सोच सकते। इसका तात्पर्य परिवार के मुखिया या जो भी अभिभावक हों उनसे भी हो सकता है। ऐसे लोगों को सम्मान देना आपको हमेशा उनका कृपापात्र बनाए रखेगा जो आपके सफल और सुखी जीवन के लिए बेहद आवश्यक है।
वर: हिंदू शास्त्रों में वर या विवाह के लिए जा रहे पुरुषों को भगवान शिव का प्रतीक माना गया है। इसलिए जब भी ये आपको राह में मिल जाएं, इनका रास्ता रोककर आगे बढ़ने की कोशिश ना करें, बल्कि इन्हें आगे जाने दें।