Wednesday, 21 March 2018

आज ही क्रूर हत्यारे नादिरशाह ने अपनी बर्बर सेना को दिया था दिल्ली के पुरुषों के नरसंहार और नारियो के बलात्कार का आदेश

22 मार्च- आज ही क्रूर हत्यारे नादिरशाह ने अपनी बर्बर सेना को दिया था दिल्ली के पुरुषों के नरसंहार और नारियो के बलात्कार का आदेश


भले ही आज मोब लिंचिंग और तमाम अन्य घटनाओं का दुष्प्रचार कर के हिन्दू समाज को सोची समझी साजिश के साथ बदनाम किया जा रहा हो लेकिन इतिहास बताता है कि हत्यारे कौन हैं , कौन हैं लुटेरे , किस ने माना इस भूमि को अपना और किस ने किया इसको पराया .. इन तमाम सवालों के जवाब अब तक जनता को मिल भी गये होते लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से एक ही परिवार के आस पास रख कर एक ही प्रकार की बदनामी करते रहने वालों को ये समझ में नहीं आया कि उन्होंने भारत की संस्कृति की जड पर वार किया है और महिमामंडित किया है उन कातिलों को जिन्होंने बहाया है भारत में भारत वालों का ही खून .आज है 22 मार्च .. ये वो दिन है जिस दिन खुलेआम एक उस लुटेरे और हत्यारे ने अपनी सेना को हिन्दुओ के नरसंहार का आदेश दिया था जिसके खिलाफ लिखने में हमारे तमाम तथाकथित इतिहासकार और सेकुलर जमात के बुद्धिजीवी न जाने क्यों शर्म जैसी महसूस करते हैं . वो दिन था 22 मार्च 1739 जब हत्यारे और धर्मांध नादिर शाह ने अपनी सेना को दिल्ली मे जनसंहार की इजाजत दी.. इसके साथ नारियो का बलात्कार भी हुआ और चौराहों पर कत्ल भी .. ये बलात्कार और कत्लेआम 58 दिनों तक चलता रहा और नादिरशाह की हत्यारी फ़ौज में एक भी ऐसा बुद्धिजीवी और सेकुलर नहीं था जो कम से कम एक बार इस क्रूर को इस नरसंहार को रोकने के लिए कह दे .इस लुटेरे क्रूर हत्यारे ने दिल्ली में प्रवेश तो 20 मार्च को ही कर लिया था . 20 मार्च 17३८ को दिल्ली मेें प्रवेश कर नादिरशाह ने 20000 के करीब लोगों का कत्ल कर दिया गया जो केवल अपनी क्रूरता का खौफ जताने के मकसद से था ..उसके बर्बर सैनिक राजधानी में घुस पड़े और उन्होंने लूटमार का बाज़ार गर्म कर दिया। उसके कारण दिल्ली के हज़ारों नागरिक मारे गये और वहाँ भारी लूट की गई। इस लूट में नादिरशाह को बेशुमार दौलत मिली थी। उसे 20 करोड़ की बजाय 30 करोड़ रुपया नक़द मिला। उसके अतिरिक्त ढेरो जवाहरात, बेगमों के बहुमूल्य आभूषण, सोने-चाँदी के अगणित वर्तमान तथा अन्य वेश-क़ीमती वस्तुएँ उसे मिली थीं। इनके साथ ही साथ दिल्ली की लूट में उसे कोहिनूर हीरा और शाहजहाँ का 'तख्त-ए-ताऊस' (मयूर सिंहासन) भी मिला था। वह बहुमूल्य मयूर सिंहासन अब भी ईरान में है या नहीं, इसका ज्ञान किसी को नहीं है। 

नादिरशाह के हाथ पड़ने वाली शाही हरम की सुंदरी बेगमों के अतिरिक्त मुहम्मदशाह की पुत्री 'शहनाज बानू' भी थी, जिसका विवाह उसने अपने पुत्र 'नसरूल्ला ख़ाँ' के साथ कर दिया। नादिरशाह प्राय: दो महीने तक दिल्ली में लूटमार करता रहा था। उसके कारण दिल्ली उजाड़ और बर्बाद सी हो गई थी। जब वह यहाँ से जाने लगा, तब करोड़ो की संपदा के साथ ही साथ वह 1,000 हाथी, 7,000 घोड़े, 10,000 ऊँट, 100 खोजे, 130 लेखक, 200 संगतराश, 100 राज और 200 बढ़ई भी अपने साथ ले गया था। नादिरशाह 17३८ में ईरान वापस गया और 17४६ में उसकी मृत्यु हो गई। अय्याशी और कुकर्म के प्रतीक रहे इस क्रूर लुटेरे और आक्रान्ता को अपने जीवन का अधिकतर समय हरम तथा हिजड़ों में बिताने तथा उसके असंयत और विलासी आचरण के कारण रंगीला कहा गया। सवाल ये है कि 58 दिन तक चले इस महापाप रूपी इतिहास को क्यों नहीं बताते मोब लिंचिंग का प्रचार करने वाले ?