Thursday, 28 September 2017

यह समस्त वरदानों और सिद्धियों को देने वाली हैं. यह कमल के पुष्प पर विराजमान हैं और इनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म है.

नवमी: किस स्वरूप में होगी मां की पूजा, जानें इनकी महिमा

नवरात्रि के अंतिम दिन नवदुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरुप की उपासना होती है. नवदुर्गा में मां सिद्धिदात्री का स्वरुप अंतिम और 9वां स्वरुप है.
यह समस्त वरदानों और सिद्धियों को देने वाली हैं. यह कमल के पुष्प पर विराजमान हैं और इनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म है.
यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग, देवी-देवता और मनुष्य सभी इनकी कृपा से सिद्धियों को प्राप्त करते हैं. इनका स्वरुप मां सरस्वती का भी स्वरुप माना जाता है. इनकी कृपा से विद्या, बुद्धि की प्राप्ति होती है. इस बार नवरात्रि का अंतिम दिन 29 अक्टूबर को होगा.
इस दिन मां सिद्धिदात्री की उपासना करने से नवरात्रि के 9 दिनों का फल प्राप्त हो जाता है. इसी दिन महानवमी की पूजा भी की जाती है.
इसको करने से जीवन में सफलता और विजय प्राप्त होती है. इस दिन देवी की उपासना अवश्य करें.
इस दिन के विशेष हवन से व्यक्ति अपनी मनोकामनाओं को पूरा कर सकता है.

देवी के 9वें स्वरुप में मां सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है, जो दरसल देवी का पूर्ण स्वरुप है.

नवरात्र‍ि नवमी: जानें, नवदुर्गा के 9वें रूप का महत्व

देवी के 9वें स्वरुप में मां सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है, जो दरसल देवी का पूर्ण स्वरुप है. केवल इस दिन मां की उपासना करने से, सम्पूर्ण नवरात्रि की उपासना का फल मिलता है.
यह पूजा नवमी तिथि पर की जाती है. महानवमी पर शक्ति पूजा भी की जाती है, जिसको करने से निश्चित रूप से विजय की प्राप्ति होती है.
आज के दिन महासरस्वती की उपासना भी होती है, जिससे अद्भुत विद्या और बुद्धि की प्राप्ति हो सकती है. इस बार देवी के 9वें स्वरुप की पूजा 29 सितम्बर को की जाएगी.
मां सिद्धिदात्री का स्वरुप
नवदुर्गा में मां सिद्धिदात्री का स्वरुप अंतिम और 9वां स्वरुप है. यह समस्त वरदानों और सिद्धियों को देने वाली हैं.
यह कमल के पुष्प पर विराजमान हैं और इनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म है. यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग, देवी-देवता और मनुष्य सभी इनकी कृपा से सिद्धियों को प्राप्त करते हैं.
इस दिन मां सिद्धिदात्री की उपासना करने से नवरात्रि के 9 दिनों का फल प्राप्त हो जाता है.
महत्व
मां सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सभी सिद्धियां प्रदान करने वाली हैं. देवीपुराण में भी लिखा है की भगवान शिव को इनकी कृपा से ही सभी सिद्धियों की प्राप्ति हुई थी. इनकी कृपा की वजह से ही भगवान शिव को ‘अर्द्धनारीश्वर’ नाम से पुकारा जाता है. देवी सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है इनकी चार भुजाएं है जिनमें बाईं ओर की एक भुजा में कमल का पुष्प है तथा दूसरी भुजा में शंख है. वहीं दाहिनी ओर की एक भुजा में गदा एवं दूसरी भुजा में चक्र विराजमान है.
मार्कंडेय पुराण के अनुसार आठ सिद्धियां है अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्व और ईशित्व. लेकिन ब्रह्ववैवर्त पुराण के अनुसार जिन सिद्धियों का वर्णन किया गया है वह इस प्रकार से हैं 1. सर्वकामावसायिता 2. सर्वज्ञत्व 3. दूरश्रवण 4. परकायप्रवेशन 5. वाक्‌सिद्धि 6. कल्पवृक्षत्व 7. सृष्टि 8. संहारकरणसामर्थ्य 9. अमरत्व 10 सर्वन्यायकत्व. इस तरह से कुल 18 सिद्धियां हैं, जिनका वर्णन हमारे पुराणों में मिलता है.
मां सिद्धिदात्री को लगाएं उनका पसंदीदा भोग
नवमी तिथि पर मां को विभिन्न प्रकार के अनाजों का भोग लगाएं जैसे- हलवा, चना-पूरी, खीर और पुए और फिर उसे गरीबों को दान करें. इससे जीवन में हर सुख-शांति मिलती है.
इस मंत्र का करें जाप
आज के दिन मां को प्रसन्न करने और शक्ति साधना की प्राप्ति के लिए मां का इस मंत्र से ध्यान करें.
सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
या देवी सर्वभू‍तेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।


Wednesday, 27 September 2017

भस्मकूट पर्वत पर स्थित शक्तिपीठ मां मंगलागौरी मंदिर

पालनपीठ' के रूप में प्रसिद्ध है गया का मां मंगलागौरी मंदिर

नवरात्र के मौके पर प्रत्येक देवी स्थानों पर भक्तों की भारी भीड़ इकट्ठा हो रही है. ऐसे में बिहार के गया शहर से कुछ ही दूरी पर भस्मकूट पर्वत पर स्थित शक्तिपीठ मां मंगलागौरी मंदिर पर सुबह से ही भक्तों का तांता लग जाता है.
मान्यता है कि यहां मां सती का वक्ष स्थल (स्तन) गिरा था, जिस कारण यह शक्तिपीठ 'पालनहार पीठ' या 'पालनपीठ' के रूप में प्रसिद्ध है.
पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक, भगवान भोले शंकर जब अपनी पत्नी सती का जला हुआ शरीर लेकर तीनों लोकों में उद्विग्न होकर घूम रहे थे तो सृष्टि को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने मां सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से काटा था.
इसी क्रम में मां सती के शरीर के टुकड़े देश के विभिन्न स्थानों पर गिरे थे, जिसे बाद में शक्तिपीठ के रूप में जाना गया. इन्हीं स्थानों पर गिरे हुए टुकड़े में स्तन का एक टुकड़ा गया के भस्मकूट पर्वत पर गिरा था.
मंगलागौरी शक्तिपीठ के पुजारी लखन बाबा उर्फ लाल बाबा कहते हैं कि इस पर्वत को भस्मकूट पर्वत कहते हैं. इस शक्तिपीठ को असम के कामरूप स्थित मां कमाख्या देवी शक्तिपीठ के समान माना जाता है.
कालिका पुराण के अनुसार, गया में सती का स्तन मंडल भस्मकूट पर्वत के ऊपर गिरकर दो पत्थर बन गए थे. इसी प्रस्तरमयी स्तन मंडल में मंगलागौरी मां नित्य निवास करती हैं जो मनुष्य शिला का स्पर्श करते हैं, वे अमरत्व को प्राप्त कर ब्रह्मलोक में निवास करते हैं.
इस शक्तिपीठ की विशेषता यह है कि मनुष्य अपने जीवन काल में ही अपना श्राद्ध कर्म यहां संपादित कर सकता है.
मान्यता है कि इस मंदिर में आकर जो भी सच्चे मन से मां की पूजा व अर्चना करते हैं, मां उस भक्त पर खुश होकर उसकी मनोकामना को पूर्ण करती है.
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यह भी माना जाता है कि यहां पूजा करने वाले किसी भी भक्त को मां मंगला खाली हाथ नहीं भेजतीं. इस मंदिर में साल भर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है. यहां गर्भगृह में ऐसे तो काफी अंधेरा रहता है, परंतु यहां वर्षों से एक दीप प्रज्वलित हो रहा है. कहा जाता है कि यह दीपक कभी बुझता नहीं है.
इस मंदिर में सिर्फ यहां के नहीं, बल्कि विदेशी भी आकर मां मंगला गौरी में पूजा अर्चना करते हैं. मां मंगला गौरी मंदिर में पूजा करने के लिए श्रद्धालुओं को 100 से ज्यादा सीढ़ी चढ़कर ऊपर जाना पड़ता है.
मंदिर के एक अन्य पुजारी संजय गिरी बताते हैं कि इस मंदिर का उल्लेख, पद्म पुराण, वायु पुराण, अग्नि पुराण और अन्य लेखों में मिलता है. तांत्रिक कार्यों में भी इस मंदिर को प्रमुखता दी जाती है. हिंदू संप्रदाय में इस मंदिर में शक्ति का वास माना जाता है.
इस मंदिर में उपा शक्ति पीठ भी है, जिसे भगवान शिव के शरीर का हिस्सा माना जाता है. शक्ति पोषण के प्रतीक को एक स्तन के रूप में पूजा जाता है.
मंदिर के गर्भगृह में देवी की प्रतिमा रखी है, यहां भव्य नक्काशी बनी हुई है. मंदिर के सामने वाले भाग में एक मंडप बना हुआ है. मंदिर परिसर में भगवान शिव और महिषासुर की प्रतिमा, मर्दिनी की मूर्ति, देवी दुर्गा की मूर्ति और दक्षिणा काली की मूर्ति भी विराजमान है. यहां कई और भी मंदिर हैं.
यहां नवरात्र में प्रतिदिन भक्तों की भीड़ जुटती है, परंतु महाष्टमी व्रत के दिन यहां बड़ी संख्या में मां के भक्त पहुंचते हैं.

नवरात्री के आठवें दिन आदि शक्ति माँ दुर्गा के महागौरी स्वरूप की उपासना विधि

नवरात्री के आठवें दिन आदि शक्ति माँ दुर्गा के महागौरी स्वरूप

नवरात्रि का 8वां दिन, महागौरी की पूजा, जानें महत्व और विधि

नवरात्रि की अष्टमी तिथि को आठ वर्ष की कन्या की पूजा करें. उसके चरण धुलाकर भोजन करवाएं. फिर उपहार देकर आशीर्वाद लें. आपकी गौरी पूजा संपन्न होगी
कौन हैं मां गौरी और क्या है इनका महत्व
नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा का विधान है. भगवान शिव की प्राप्ति के लिए इन्होंने कठोर पूजा की थी, जिससे इनका शरीर काला पड़ गया था. जब भगवान शिव ने इनको दर्शन दिया, तब उनकी कृपा से इनका शरीर अत्यंत गौर हो गया और इनका नाम गौरी हो गया.
माना जाता है कि माता सीता ने श्री राम की प्राप्ति के लिए इन्हीं की पूजा की थी. मां गौरी श्वेत वर्ण की हैं और श्वेत रंग में इनका ध्यान करना अत्यंत लाभकारी होता है.
विवाह सम्बन्धी तमाम बाधाओं के निवारण मैं इनकी पूजा अचूक होती है. ज्योतिष में इनका सम्बन्ध शुक्र नामक ग्रह से माना जाता है. इस बार माता गौरी की पूजा 28 सितम्बर को की जाएगी
क्या है मां गौरी की पूजा विधि
पीले वस्त्र धारण करके पूजा आरम्भ करें. मां के समक्ष दीपक जलाएं और उनका ध्यान करें.
पूजा में मां को श्वेत या पीले फूल अर्पित करें. उसके बाद इनके मन्त्रों का जाप करें.
अगर पूजा मध्य रात्रि में की जाय तो इसके परिणाम ज्यादा शुभ होंगे.
किस प्रकार मां गौरी की पूजा से करें शुक्र को मजबूत
मां की उपासना सफेद वस्त्र धारण करके करें. मां को सफेद फूल और सफेद मिठाई अर्पित करें.
साथ में मां को इत्र भी अर्पित करें.
पहले मां के मंत्र का जाप करें. फिर शुक्र के मूल मंत्र "ॐ शुं शुक्राय नमः" का जाप करें.
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मां को अर्पित किया हुआ इत्र अपने पास रख लें और उसका प्रयोग करते रहें.
अष्टमी तिथि के दिन कन्याओं को भोजन कराने की परंपरा है, इसका महत्व और नियम क्या है
नवरात्रि केवल व्रत और उपवास का पर्व नहीं है. यह नारी शक्ति के और कन्याओं के सम्मान का भी पर्व है.
इसलिए नवरात्रि में कुंवारी कन्याओं को पूजने और भोजन कराने की परंपरा भी है.
हालांकि नवरात्रि में हर दिन कन्याओं के पूजा की परंपरा है, पर अष्टमी और नवमी को अवश्य ही पूजा की जाती है.
2 वर्ष से लेकर 11 वर्ष तक की कन्या की पूजा का विधान किया गया है.
अलग-अलग उम्र की कन्या देवी के अलग अलग रूप को बताती है.
अगर जरूरत के समय धन नहीं रहता तो करें ये उपाय
मां गौरी को दूध की कटोरी में रखकर चांदी का सिक्का अर्पित करें.
इसके बाद मां गौरी से धन के बने रहने की प्रार्थना करें.
सिक्के को धोकर सदैव के लिए अपने पास रख लें

Tuesday, 26 September 2017

नवरात्र का 7वां दिन: मां कालरात्रि की करें पूजा, जानें विधि

नवरात्र का सातवां दिन आ गया है. नवरात्रों में मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा होती है. मां कालरात्रि विरोधी और शत्रु को ठीक करती हैं.



माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन 'सहस्रार' चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। देवी कालात्रि को व्यापक रूप से माता देवी - काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, मृित्यू, रुद्रानी, चामुंडा, चंडी और दुर्गा के कई विनाशकारी रूपों में से एक माना जाता है। रौद्री और धुमोरना देवी कालात्री के अन्य कम प्रसिद्ध नामों में हैं |
यह ध्यान रखना जरूरी है कि नाम, काली और कालरात्रि का उपयोग एक दूसरे के परिपूरक है, हालांकि इन दो देवीओं को कुछ लोगों द्वारा अलग-अलग सत्ताओं के रूप में माना गया है। डेविड किन्स्ले के मुताबिक, काली का उल्लेख हिंदू धर्म में लगभग ६०० ईसा के आसपास एक अलग देवी के रूप में किया गया है। कालानुक्रमिक रूप से, कालरात्रि महाभारत में वर्णित, ३०० ईसा पूर्व - ३०० ईसा के बीच वर्णित है जो कि वर्त्तमान काली का ही वर्णन है |[1]
माना जाता है कि देवी के इस रूप में सभी राक्षस,भूत, प्रेत, पिसाच और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है, जो उनके आगमन से पलायन करते हैं |
सिल्प प्रकाश में संदर्भित एक प्राचीन तांत्रिक पाठ, सौधिकागम, देवी कालरात्रि का वर्णन रात्रि के नियंत्रा रूप में किया गया है। सहस्रार चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है। उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य (सिद्धियों और निधियों विशेष रूप से ज्ञान, शक्ति और धन) का वह भागी हो जाता है। उसके समस्त पापों-विघ्नों का नाश हो जाता है और अक्षय पुण्य-लोकों की प्राप्ति होती है।

श्लोक

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता | लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी || वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा | वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयन्करि ||

वर्णन

इनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं। ये तीनों नेत्र ब्रह्मांड के सदृश गोल हैं। इनसे विद्युत के समान चमकीली किरणें निःसृत होती रहती हैं।
माँ की नासिका के श्वास-प्रश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालाएँ निकलती रहती हैं। इनका वाहन गर्दभ (गदहा) है। ये ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वरमुद्रा से सभी को वर प्रदान करती हैं। दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का काँटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग (कटार) है।

महिमा

माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम 'शुभंकारी' भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता न
हीं है।
माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है।
माँ कालरात्रि के स्वरूप-विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करके मनुष्य को एकनिष्ठ भाव से उपासना करनी चाहिए। यम, नियम, संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिए। मन, वचन, काया की पवित्रता रखनी चाहिए। वे शुभंकारी देवी हैं। उनकी उपासना से होने वाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती। हमें निरंतर उनका स्मरण, ध्यान और पूजा करना चाहिए।

मंदिर

  • कालरात्रि मंदिर, डुमरी बुजुर्ग गांव ,नयागांव, सारण (बिहार)[2]
  • कालरात्रि-वाराणसी मंदिर, डी 8/17, कालिक गाली, जो कि अन्नपूर्णा के समानांतर लेनिन - विश्वनाथ

मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कालरात्रि के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे पाप से मुक्ति प्रदान कर।
ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रै नमः |




Monday, 25 September 2017

आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत ने सोमवार को खुले तौर पर पाकिस्तान से आने वाले आतंकियों को चेतावनी दी है. रावत ने कहा, 'सरहद के उस पार जो आतंकवादी हैं, वो तैयार बैठे हैं. हम भी उनके लिए इस तरफ तैयार बैठे हैं'

आर्मी चीफ बोले- PAK नहीं सुधरा तो फिर करेंगे सर्जिकल स्ट्राइक

पाकिस्तान पर भारत की सर्जिकल स्ट्राइक को एक साल पूरा होने जा रहा है. इस मौके पर जहां पाकिस्तान अपनी हार का बदला लेने की नापाक साजिशें रच रहा है, वहीं भारतीय सुलक्षाबल उसे मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार बैठे हैं.
आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत ने सोमवार को खुले तौर पर पाकिस्तान से आने वाले आतंकियों को चेतावनी दी है. रावत ने कहा, 'सरहद के उस पार जो आतंकवादी हैं, वो तैयार बैठे हैं. हम भी उनके लिए इस तरफ तैयार बैठे हैं'.
इतना ही नहीं जनरल रावत ने इससे आगे बढ़कर बेहद सख्त अंदाज में आतंकियों को चेताया. उन्होंने कहा, 'वो (आतंकवादी) इधर आएंगे, हम उनको रिसीव करके, ढाई फीट जमीन के नीचे भेजते रहेंगे'.
'फिर होगी सर्जिकल स्ट्राइक'
जनरल बिपिन रावत ने एक बार फिर पाकिस्तान को सर्जिकल स्ट्राइक की भी चेतावनी दी. जनरल रावत ने कहा, 'सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए एक संदेश देना था, जो हमने दिया. अगर वो नहीं समझेंगे तो फिर सर्जिकल स्ट्राइक की जाएगी'.
सेना ने किया नाकाम
वहीं दूसरी तरफ एक और बड़ी जानकारी इस संबंध में सामने आई है. जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में जैश-ए मोहम्मद के जिन 4 आतंकियों को ढेर किया गया है, वो दरअसल सर्जिकल स्ट्राइक का बदला लेने की रणनीति के तहत ही वहां आए थे. मगर, सुरक्षाबलों ने पहले ही उनके नापाक इरादों को खाक कर दिया.
हालांकि, अभी खतरा टला नहीं है. बताया जा रहा है कि ये चारों जैश-ए मोहम्मद के जिस ग्रुप का हिस्सा थे, उसमें कुल 15 आतंकी थे. आतंकियोें का ये ग्रुप उत्तरी कश्मीर से भारत की सरहद में दाखिल हुआ था.
बता दें कि भारत ने 2016 में 29 सितंबर की रात पाकिस्तान की सरहद में घुसकर उस पर वार किया था. जिसके बाद से ही पाकिस्तान बौखलाया हुआ है और एक बार फिर उरी हमले जैसे किसी बड़े अटैक को सर्जिकल स्ट्राइक का एक साल पूरा होने के मौके पर अंजाम देने की फिराक में था.

हर गम दूर करती हैं 'मां कात्यायनी'

नवरात्र छठा दिन: देवी कात्यायनी की पूजा विधि, प्रसाद में इन्हें शामिल जरूर करें



नवरात्र के छठे दिन देवी के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा का विधान है। मां के इस रूप के प्रगट होने की बड़ी ही अद्भुत कथा। माना जाता है कि देवी के इसी स्वरूप ने महिषासुर का मर्दन किया था। देवीभाग्वत पुराण के अनुसार देवी के इस स्वरूप की पूजा गृहस्थों और विवाह के इच्छुक लोगों के लिए बहुत ही फलदायी है।

इस तरह देवी का छठा स्वरूप कहलाया कात्यायनी 
महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया। महर्षि कात्यायन के नाम पर ही देवी का नाम कात्यायनी हुआ। मां कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं। यह दानवों, असुरों और पापी जीवधारियों का नाश करने वाली देवी कहलाती हैं।
चार भुजाधारी और सिंह पर सवार हैं मां
सांसारिक स्वरूप में मां कात्यायनी शेर पर सवार रहती हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। सुसज्जित आभा मंडल युक्त देवी मां का स्वरूप मन मोहक है। इनके बांए हाथ में कमल व तलवार और दाहिने हाथ में स्वस्तिक और आशीर्वाद की मुद्रा अंकित है। नवरात्र की षष्ठी तिथि के दिन देवी के इसी स्वरूप की पूजा होती है। क्योंकि इसी तिथि में देवी ने जन्म लिया था और महर्षि ने इनकी पूजा की थी।
मां के इस स्वरूप को पूजने वाले में होती है यह खूबी
मान्यता के अनुसार, नवरात्र के छठे दिन साधक का मन 'आज्ञा चक्र' में स्थित रहता है। योग साधना में आज्ञा चक्र का महत्वपूर्ण स्थान है। आज्ञाचक्र मानव शरीर में उपस्थित 7 चक्रों में सर्वाधिक शक्तिशाली है। इस दिन ध्यान का प्रयास करने से भक्त को सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं। जो भी भक्त मां के इस स्वरूप का पूजन करते हैं, उनके चेहरे पर एक अलग कांति रहती है। वह इस लोक में रहते हुए भी अलौकिक सुख का अनुभव करता है। उसका तेज देखते ही बनता है।

आज इस मंत्र से करें मां का पूजन, मिलेगा लाभ
चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।

यह है शुभ रंगनवरात्र के छठे दिन लाल रंग के वस्त्र पहनें। यह रंग शक्ति का प्रतीक होता है। मां कात्यायी को मधु यानी शहद युक्त पान बहुत पसंद है। इसे प्रसाद स्वरूप अर्पण करने से देवी अति प्रसन्न होती हैं।

कुछ गलत दिखाया तो अंजाम भी होगा और भी गलत - करणी सेना

हिन्दुओं की माँ जैसी हैं रानी पद्मावती, कुछ गलत दिखाया तो अंजाम भी होगा और भी गलत - 

करणी सेना


संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती पर एक बार फिर से राजपूत करणी सेना ने निशाना साधा है... आज मेकर्स ने फिल्म में रानी पद्मावती बनी दीपिका पादुकोण का लुक जारी किया... एक तरफ जहां दीपिका के इस शाही लुक की हर तरफ तारीफ हो रही है... वहीं राजपूत करणी सेना ने इसके मेकर्स को चेतावनी दी है... फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी का किरदार निभा रहे रणवीर सिंह ने कल अपने ट्विटर पर जानकारी दी थी कि... 

रानी पद्मावती यानी की दीपिका का लुक जारी किया जाएगा... उन्होंने ट्वीट करके लिखा...रानी पद्मावती पधार रही हैं...सूर्योदय के साथ... रणवीर के इस ट्वीट का जवाब देते हुए राजपूत करणी सेना ने अपने ट्विटर अकाउंट से ट्वीट करके लिखा कि...रानी पद्मावती अगर रानी पद्मावती बनकर पधार रही हैं तो स्वागत हैं, वरना रुकावट के लिए खेद होगा....आपको बता दें कि राजपूत करणी सेना का पद्मावती के मेकर्स पर आरोप है कि इस फिल्म में रानी पद्मावती और उनसे जुड़ी ऐतिहासिक कहानी और किस्सों के साथ छेड़छाड़ करके के तोड़ मरोड़ कर बड़े पर्दे पर पेश किया जा रहा है....

साथ ही अपने अगले ट्वीट में राजपूत करणी सेना ने लिखा कि आशा है कि पद्मावती में तत्थों से छेड़छाड़ करके लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं किया जाएगा...आपको बता दें कि अपने इसी आरोप के चलते इससे पहले, राजपूत करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने जयपुर के जयगढ़ किले में लगे फिल्म के सेट पर तोड़फोड़ की थी... यहां तक कि  उन्होंने फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली को भी नहीं बक्शा और उनके साथ हाथापाई भी की थी...



Sunday, 24 September 2017

नवरात्र में माता दुर्गा के पांचवे स्वरूप में मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है

पांचवें दिन ऐसे करें स्कंदमाता की पूजा


नवरात्र में माता दुर्गा के पांचवे स्वरूप में मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है

भगवती दुर्गा के पांचवे स्वरुप को स्कंदमाता के रूप में जाना जाता है. शास्त्रों के अनुसार नवरात्र में माता दुर्गा के पांचवे स्वरूप में मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है. इनकी उपासना करने से भक्त की सर्व इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं. भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है.
स्कंदमाता का स्वरूप
स्कंद का अर्थ है कुमार कार्तिकेय अर्थात माता पार्वती और भगवान शिव के जेष्ठ पुत्र कार्तिकय. जो भगवान स्कंद कुमार की माता है वही है मां स्कंदमाता. शास्त्र अनुसार देवी स्कंदमाता ने अपनी दाई तरफ की ऊपर वाली भुजा से बाल स्वरुप में भगवान कार्तिकेय को गोद में लिया हुआ है.
स्कंदमाता स्वरुपिणी देवी की चार भुजाएं हैं. ये दाहिनी तरफ की ऊपर वाली भुजा से भगवान स्कंद को गोद में पकड़े हुए हैं. बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा वरमुद्रा में और नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है, उसमें कमल-पुष्प लिए हुए हैं.
कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है. सिंह इनका वाहन है. शेर पर सवार होकर माता दुर्गा अपने पांचवें स्वरुप स्कंदमाता के रुप में भक्तजनों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहती हैं. इन्हें कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री कहा जाता है. देवी स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं तथा इनकी मनोहर छवि पूरे ब्रह्मांड में प्रकाशमान होती है.
उपासना का मंत्र
या देवी सर्वभू‍तेषु स्कंदमाता रूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:
अर्थात् सिंह पर सवार रहने वाली और अपने दो हाथों में कमल का फूल धारण करने वाली यशस्विनी स्कंदमाता हमारे लिए शुभदायी हो.

Saturday, 23 September 2017

मां कूष्माण्डा..सुने हर दिल की पुकार

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।





नवरात्र का चौथा दिन मां कूष्माण्डा के नाम है। अपनी मंद मुस्कान से अण्ड को उत्पन्न करने के कारण इनकी प्रसिद्धि कूष्माण्डा के नाम से हुई है। मां का यह रूप बहुत ही सरस है। जो हर किसी की पुकार सुनती हैं। मां मन की चंचलता को शांत करती हैं और व्यक्ति को गति प्रदान करती हैं। मां के इस रूप के बारे में पुराणों में जिक्र है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अतः ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। माँ कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल की वृद्धि होती है। माँ कूष्माण्डा अल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है। इस दिन मां का नाम लेकर ध्यान करना चाहिए। मां के इस रूप से पूजने वाले व्यक्ति के पौरूष में कभी कमी नहीं होती है, वो दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की करता है। वो जब तक धरती पर रहेगें, तब तक उसका कुल आबाद रहता है। इनका शरीर सूर्य की कांति के समान है। इनकी आठ भुजाएं हैं इसलिए ये अष्टभुजा भी कहलाती हैं। इनके दाहिनी ओर के चार हाथों में क्रमश: कमण्डलु, धनुष, बाण और कमल सुशोभित हैं तथा बाई ओर के हाथों में अमृत कलश, जप माला, गदा और चक्र हैं। इनके कानों में सोने के आभूषण और सिर पर सोने का मुकुट है। ये सिंह पर विराजमान हैं।




Friday, 22 September 2017

नवरात्रि तीसरा दिन: आज करें मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें पूजा का महत्व

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का पूजा की जाती है। 

पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता | प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ||


मां चंद्रघंटा का रूप बहुत ही सौम्य है। मां को सुगंधप्रिय है। उनका वाहन सिंह है। उनके दस हाथ हैं। हर हाथ में अलग-अलग शस्त्र हैं। वे आसुरी शक्तियों से रक्षा करती हैं। मां चंद्रघंटा की आराधना करने वालों का अहंकार नष्ट होता है और उनको सौभाग्य, शांति और वैभव की प्राप्ति होती है।
ऐसा है मां का स्वरुप: 
मां दुर्गा के तीसरे स्वरुप का नाम चंद्रघंटा है। इनके मस्तक में घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। मां चंद्रघंटा सिंह पर विराजती हैं। मां चंद्रघंटा देवी का स्वरूप सोने के समान कांतिवान है। देवी मां की दस भुजाएं हैं और दसों हाथों में खड्ग, बाण है। मां चंद्रघंटा के गले में सफेद फूलों की माला रहती है।  
पूजन का मंत्र:  
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।
किस रंग के पहनें कपड़े और क्या चढ़ाएं प्रसाद: 
देवी चंद्रघंटा को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धालुओं को भूरे रंग के कपड़े पहनने चाहिए। मां चंद्रघंटा को अपना वाहन सिंह बहुत प्रिय है और इसीलिए गोल्डन रंग के कपड़े पहनना भी शुभ है। इसके अलावा मां सफेद चीज का भोग जैसै दूध या खीर का भोग लगाना चाहिए। इसके अलावा माता चंद्रघंटा को शहद का भोग भी लगाया जाता है।
देवी पूजा का महत्‍व 
नवरात्रि में तीसरे दिन इस देवी की पूजा का महत्व है। देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाईं देने लगती हैं। इन क्षणों में साधक को बहुत सावधान रहना चाहिए। इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है।

उपासना

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।
इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएँ। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।


Thursday, 21 September 2017

देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है। देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं

आज है दूसरा नवरात्र मां ब्रह्मचारिणी का दिन, जानिए पूजा और व्रत विधि से कर सकते हैं उनको प्रसन्न



Puja, Vrat Vidhi: देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है। देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं
ब्रह्मचारिणी” माँ दुर्गा का दूसरा रूप हैं। इनकी उपासना नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली मां ब्रह्मचारिणी। यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन हैं। मुख पर कठोर तपस्या के कारण अद्भुत तेज और कांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोको को उजागर कर रहा है। देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है। देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप हैं। इस देवी के कई अन्य नाम हैं जैसे तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित साधक मां ब्रह्मचारिणी जी की कृपा और भक्ति को प्राप्त करता है।
देवी ब्रह्मचारिणी, माँ पार्वती के जीवन काल का वो समय था जब वे भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या कर रही थी। तपस्या के प्रथम चरण में उन्होंने केवल फलों का सेवन किया फिर बेल पत्र और अंत में निराहार रहकर कई वर्षो तक तप कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देने वाला है। देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है, तथा जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है।भगवती को नवरात्र के दूसरे दिन चीनी का भोग लगाना चाहिए और ब्राह्मण को दान में भी चीनी ही देनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य दीर्घायु होता है। इनकी उपासना करने से मनुष्य में तप, त्याग, सदाचार आदि की वृद्धि होती है।
ब्रह्मचारिणी पूजा विधि : 
देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा का विधान इस प्रकार है, सर्वप्रथम आपने जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को कलश में आमत्रित किया है उनकी फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें व देवी को जो कुछ भी प्रसाद अर्पित कर रहे हैं उसमें से एक अंश इन्हें भी अर्पण करें। प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें। कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें। इनकी पूजा के पश्चात मॉ ब्रह्मचारिणी की पूजा करें। देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें “दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू. देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा”.. इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को अरूहूल का फूल (लाल रंग का एक विशेष फूल) व कमल काफी पसंद है उनकी माला पहनायें। प्रसाद और आचमन के पश्चात् पान सुपारी भेंट कर प्रदक्षिणा करें और घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें। निम्नलिखित मंत्रो से ब्रह्मचारिणी का ध्यान, ब्रह्मचारिणी की स्तोत्र पाठ एवं ब्रह्मचारिणी की कवच पाठ करे।
ब्रह्मचारिणी का ध्यान :
वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
ब्रह्मचारिणी की स्तोत्र पाठ :
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥
ब्रह्मचारिणी की कवच :
त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।
अंत में क्षमा प्रार्थना करें “आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी” ।