Sunday, 31 December 2017

आर्यवृत के वासी हैं हम , अब अपना नववर्ष मनाएंगे ।। *

हवा लगी पश्चिम की , सारे कुप्पा बनकर फूल गए । 
ईस्वी सन तो याद रहा , पर अपना संवत्सर भूल गए ।। 
चारों तरफ नए साल का , ऐसा मचा है हो-हल्ला । 
बेगानी शादी में नाचे , जैसे कोई दीवाना अब्दुल्ला ।।
धरती ठिठुर रही सर्दी से , घना कुहासा छाया है । 
*कैसा ये नववर्ष है , जिससे सूरज भी शरमाया है ।।
*सूनी है पेड़ों की डालें , फूल नहीं हैं उपवन में ।
पर्वत ढके बर्फ से सारे , रंग कहां है जीवन में ।।
बाट जोह रही सारी प्रकृति , आतुरता से फागुन का ।
जैसे रस्ता देख रही हो , सजनी अपने साजन का ।।
अभी ना उल्लासित हो इतने , आई अभी बहार नहीं ।
हम अपना नववर्ष मनाएंगे , न्यू ईयर हमें स्वीकार नहीं ।।
लिए बहारें आँचल में , जब चैत्र प्रतिपदा आएगी ।
फूलों का श्रृंगार करके , धरती दुल्हन बन जाएगी ।।
मौसम बड़ा सुहाना होगा , दिल सबके खिल जाएँगे ।
झूमेंगी फसलें खेतों में , हम गीत खुशी के गाएँगे ।।
उठो खुद को पहचानो , यूँ कबतक सोते रहोगे तुम ।
चिन्ह गुलामी के कंधों पर , कबतक ढोते रहोगे तुम ।।
अपनी समृद्ध परंपराओं का , आओ मिलकर मान बढ़ाएंगे ।
आर्यवृत के वासी हैं हम , अब अपना नववर्ष मनाएंगे ।। 

Monday, 18 December 2017

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दुबारा जन्म लेने से पहले कब तक भटकती है आत्मा?



1
जिन्दगी का अर्थ
जिस जिन्दगी को हम जी रहे हैं, क्या बस यही जिन्दगी हमारी अपनी है? जन्म लेने से पहले हम किन हालातों में रहे होंगे, क्या कर रहे होंगे? मृत्यु के पश्चात हमारे शरीर का तो अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा लेकिन हमारी आत्मा का क्या होगा? यह कुछ सवाल अक्सर मेरे मस्तिष्क को कचोटते रहते हैं। बहुत हद तक संभव है कि ये सवाल एक कॉमन सोच भी हो सकती है जो सामान्य मस्तिष्क में उथल-पुथल का कारण बन जाए।
2
आत्मा का सफर
इन्हीं सवालों को हल करने के लिए वह एक ऐसे जवाब तक जा पहुंची जो वाकई किसी को भी हैरान कर सकती है। हम आध्यात्मिक गुरुओं के पास जाते हैं क्योंकि हम अपने जीवन का उद्देश्य और मृत्यु के बाद के हालातों को समझना चाहते हैं। आइए जानते हैं मृत्यु के पश्चात और पुनर्जन्म से पहले आत्मा को किन चरणों से होकर गुजरना पड़ता है या फिर कह लीजिए किन हालातों का सामना करना पड़ता है।
3
अच्छे-बुरे कर्म
जीवित अवस्था में, नश्वर शरीर में रहते हुए हमारी आत्मा जो भी पुण्य या पाप कृत्य करती है, अच्छे-बुरे जो भी कर्म करती है, मृत्यु के पश्चात हमारी आत्मा को उन्हीं के आधार पर ट्रीट किया जाता है। हमें अपने कर्मों के आधार पर अलग-अलग लोकों में तब तक रहना होता है, जब तक कि हम पुनर्जन्म लेकर धरती पर दोबारा ना आ जाएं।
4
स्वर्गलोक
सबसे ऊपरी लोक होता है स्वर्गलोक। जानकारों का कहना है कि आज के हालातों में 100 में से मात्र 2 लोग ही ऐसे होते हैं जिनकी आत्मा मृत्यु के पश्चात स्वर्गलोक या महरलोक के दर्शन करती है, वहां के सुख भोग पाती है। अन्य आत्माएं तो सिर्फ पाताल या भुवरलोक में जाकर फंस जाती हैं।
5
पाताल लोक के स्तर
पाताल लोक के भी सात स्तर होते हैं। कर्मों के हिसाब से आत्माएं पाताल के विभिन्न स्तरों पर भेजी जाती हैं। सबसे निचले स्तर पर उन्हें पिशाचों के साथ रहना होता है जहां अत्यंत गर्मी और बहुत बुरे हालात होते हैं।
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भुवरलोक में क्या होता है आत्मा के साथ
भुवरलोक में आत्मा स्वेच्छा के साथ नहीं रह सकती। जिस तरह धरती पर व्यक्ति अपनी मनमानी करता है, भुवरलोक में यह सब संभव नहीं है। यहां जितनी भी आत्माएं पहुंचती हैं, उन्हें स्वर्गलोक में रहने वाली पुण्य आत्माओं की निगरानी में रहना होता है। स्वर्ग लोक वो पहुंचता है जो अपने जीवनकाल में अध्यात्म के चरम तक जा पहुंचता है।
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प्रेत आत्माओं का नियंत्रण
भुवरलोक में पहुंचने वाली आत्माएं अगर अपनी आध्यात्मिक मजबूती खो दें तो वह बहुत जल्दी पिशाचों, बुरी आत्माओं और प्रेतों के नियंत्रण आ जाती हैं। वो अपने ऊपर किसी बाहरी नियंत्रण को महसूस भी कर सकती हैं।
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पाताल लोक में हालात
धरती पर इंसान चाहे कितने ही कष्ट या बुरी परिस्थितियों में हो सकता है, लेकिन वह हालात, पाताल के हालातों से बहुत बेहतर हैं। पाताल लोक में शत-प्रतिशत आत्माएं नकारात्मक शक्तियों के नियंत्रण में रहती हैं, जो उनसे कहीं ज्यादा ताकतवर होते हैं।
9
निचले स्तर पर बुरी ताकतें
पाताल लोक के जितने ज्यादा निचले स्तर पर जाते जाएंगे, दुख-तकलीफों और नकारात्मक हालातों की घुटन और ज्यादा बढ़ती जाएगी। हमें निचले स्तर पर दोबारा जन्म लेने से करीब 400-500 वर्ष पहले तक रहना पड़ सकता है।
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पाताल की प्रताड़ना
पाताल लोक और निचले लोक की प्रताड़ना से व्यक्ति को मात्र एक ही चीज बचा सकती है और वो है उसका आध्यात्मिक विकास। यहां तक स्वर्ग में बिताए जाने वाले समय को भी आध्यात्मिक झुकाव द्वारा बढ़ाया जा सकता है। यहां तक कि मृत्यु के पश्चात हमारी आत्मा कितना ज्यादा आध्यात्मिक झुकाव रखती है, वह भी हमारे पुण्य कर्मों को बढ़ाकर जल्द से जल्द हमें धरती पर वापस आने का अवसर देता है।
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ताकतवर आत्माएं
हालांकि यह इतना आसान नहीं होता क्योंकि शक्तिशाली और बुरी आत्माएं हमें किसी भी प्रकार के आध्यात्मिक कृत्य करने से रोकती हैं। वे इतनी ताकतवर होती हैं कि उनके सामने हम पूरी तरह निष्क्रिय साबित हो सकते हैं।
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स्वर्ग की सुविधाएं
जहां एक ओर पाताल लोक की बुरी शक्तियां हमें अध्यात्म की ओर बढ़ने नहीं देतीं, वहीं स्वर्ग लोक की सुख-सुविधाओं में खोकर आत्मा अपना पहला कर्म, जो कि ईश्वर को याद करना है, को भूल जाती है। दोनों ही हालातों में नुकसान भुगतना पड़ता है।
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पूर्वजन्म को जानना
इंसान केवल अपना पिछला जन्म ही जान सकता है। यूं तो आत्मा धरती पर ना जाने कितनी बार जन्म लेती है परंतु जब तक कि उसके अन्य जन्मों में कुछ खास ना घटित हुआ हो, वह केवल अपने पिछले जन्म के विषय में ही जान सकता है।
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पूर्वजन्म की यादें
जब बच्चे का जन्म होता है, उसे पूर्वजन्म की हर बात याद रहती है, लेकिन जैसे-जैसे वो दुनियावी चीजों में मशगूल हो जाता है, धीरे-धीरे कर वह सारी बातें अपने दिमाग से निकालने लगता है।
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धरती पर जन्म लेने का उद्देश्य
धरती पर जन्म लेने का एकमात्र उद्देश्य होता है, कर्म करना। दुनियावी लेन-देन ना तो पाताल लोक में संभव है और ना ही किसी और लोक में, इसलिए आत्मा को दोबारा धरती पर आना ही पड़ता है। दूसरा, आध्यात्मिक कार्य करना भी एक जरूरी प्रक्रिया है जो धरती पर जन्म लेने वाली हर आत्मा को करनी ही चाहिए। जो ये नहीं करते, उनकी आत्मा बाद में कष्ट भोगती है।
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अध्यात्म का महत्व
चलिए उपरोक्त विश्लेषण से एक बात तो स्पष्ट है कि ईश्वर के प्रति आस्था और अध्यात्म की ओर झुकाव, बड़ी से बड़ी मुश्किल से भी व्यक्ति को बचा सकती है, चाहे वे मुसीबत जीवित अवस्था में सामने आएं या फिर मरने के पश्चात।

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हिन्दू परिवार संघटन संस्था

इस प्रकार कभी खाली नहीं जाएगी प्रार्थना

इस प्रकार कभी खाली नहीं जाएगी प्रार्थना


1
भगवान का अस्तित्व
भगवान का वास्तविक अस्तित्व क्या है, यह हमेशा एक विवादित विषय रहा है। विज्ञान को मानने वाले इसे रहस्य की बजाय एक आत्मा के विश्वास से जुड़ा मानते हैं और ब्रह्मांड ऊर्जा को इसकी शक्ति बताते हैं। विज्ञान की इस थ्योरी की मानें तो भगवान और कुछ नहीं, लेकिन ब्रह्मांड की वह असीमित ऊर्जा है।
2
शास्त्र
इसके अनुसार इस ऊर्जा से जुड़ाव ही मनुष्य को एक असीमित शक्ति का एहसास कराता है। इसे ही हम ‘भगवान’ का नाम देते हैं। शास्त्रों को मानने वाले ईश्वर के अस्तित्व की अलग ही व्याख्या करते हैं। भगवान का असली स्वरूप क्या है उसे यह भी पुख्ता नहीं करता, लेकिन यह भगवान को सर्वशक्तिमान मानकर उसकी पूजा करता है।
3
प्रार्थना
दिलचस्प बात यह है कि अलग-अलग संस्कृतियों और धर्म में भगवान के रूप अलग-अलग हैं लेकिन एक चीज उन सभी में समान है, वह है परमेश्वर की कृपा पाने के लिए प्रार्थना करना! चाहे वह हिंदू धर्म का कर्मकांडीय रूप हो, मुस्लिम का पैगंबर स्वरूप या ईसाई धर्म की चर्च व्यवस्था, एक सर्वशक्तिमान की अराधना से जीवन सुधार करने की इच्छा और विश्वास हर धर्म में है।
4
प्रार्थना
प्रार्थना करना ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का सबसे आसान तरीका है। ईश्वर के होने या ना होने की बहस अलग है और प्रार्थनाओं की महत्ता अलग। भले ही आप ईश्वर के मान्य स्वरूपों को ना मानते हों, लेकिन इसके वैज्ञानिक आधारों को मानने वाले भी इतना अवश्य स्वीकार करते हैं कि परेशानियों से उबर सकने ने में यह उनका आत्मविश्वास बढ़ाता है।\
5
प्रार्थना
कई बार ऐसा होता है कि लगातार प्रार्थनाओं के बाद भी आपकी परेशानियां कम नहीं होतीं, जबकि कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपनी प्रार्थनाएं हमेशा पूरी होने की बात कहते हैं। आखिर इसकी वजह क्या है? क्या यह आपकी भक्ति की कमी दिखाता है या कारण कुछ और है?
6
प्रार्थना का तरीका
ऐसे में यह भी होता है कि धीरे-धीरे आपका विश्वास भगवान से उठने लगता है, आप चिड़चिड़े हो जाते हैं... हालातों से हताश और निराश होकर हिम्मत हारने लगते हैं... तो क्या कभी आपने सोचा है कि आपकी प्रार्थना करने का तरीका ही गलत हो सकता है?
7
प्रार्थना के नियम
जी हां, शायद आपने कभी ऐसा सोचा ना हो लेकिन प्रार्थनाओं के स्वरूप भी आपकी प्रर्थना की स्वीकार्यता या उसके अस्वीकार होने की स्थितियां तय करती हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपकी प्रार्थना हमेशा स्वीकार हो, तो इसे करते हुए आपको हमेशा कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए, आगे हम इसकी चर्चा कर रहे हैं...
8
धन्यवाद ज्ञापन
परेशानियों में घिरे हुए आप हमेशा यही कहते हैं – “भगवान, आखिर तूने ऐसा क्यों किया?..या.. तू मेरे साथ ही ऐसा क्यों करता है?” वैगैरह.. वगैरह!.. लेकिन सोचिए जब आपकी कोई इच्छा पूरी होती है या अचानक कोई खुशी मिलती है, तब भी क्या आप भगवान को इसके लिए ‘धन्यवाद’ कहते हैं?
9
धन्यवाद ज्ञापन
तात्पर्य यह कि मुसीबतों के समय परेशान होते हुए जब आप भगवान को कोस सकते हैं तो अपने साथ होने वाली अच्छी चीजों के लिए आपको उनका धन्यवाद ज्ञापन भी करना चाहिए। अगर हम यह मानकर चलते हैं कि सभी प्राणी उसी एक ईश्वर की संतानें हैं, तो यह भी समझना हमारा ही कर्तव्य है कि अपनी संतान के दुखों से उसके माता-पिता को सबसे अधिक दुख होता है।
10
धन्यवाद ज्ञापन
याद कीजिए जब आपके परिवार में किसी ने आपसे निराश होकर आपको कुछ बुरा कहा होगा। आपको कहीं ना कहीं इसने हताशा महसूस करायी होगी, लेकिन जब आपके कामों की प्रशंसा होती है तो आपको अच्छा भी महसूस होता है।
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धन्यवाद ज्ञापन
वास्तव में इन दोनों ही चीजों से सीधे तौर पर आपको कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन यह उस व्यक्ति के दिल में आपकी महत्ता आपको महसूस कराती है जो उसके प्रति आपका प्रेम प्रगाढ़ करता है। इसलिए भगवान से जब भी प्रार्थना करें, उससे पूर्व आपके साथ जीवन में हुई अच्छी बातों या पूरी हुई इच्छाओं-प्रार्थनाओं के लिए सबसे पहले उनका धन्यवाद करें।
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स्वार्थ-रहित
आपने कबीर का वह दोहा शायद सुना हो – “साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा ना रहूं, साधु ना भूखा जाए॥” प्रार्थनाएं करें, लेकिन वह आपकी अपनी और औरों की भलाई के लिए होना चाहिए। भले ही उससे आपके सिवा किसी और का हित ना हो रहा हो, लेकिन...
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स्वार्थ-रहित
उसमें किसी और का अहित कर आपका हित करने की भावना बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। वरना वे प्रार्थनाएं पूरी तो नहीं होंगी, साथ ही भविष्य में आपका बुरा भी हो सकता है।
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विश्वास
एक कहावत है – “मानो तो पत्थर , मानो तो भगवान है!” तात्पर्य यह कि आपकी सफलता पूरी तरह आपके विश्वास पर निर्भर करती है। भक्ति का पहला नियम भी विश्वास ही है, इसलिए जब भी प्रार्थना करें, वह चाहे किसी भी रूप में हो, आपके मन में यह विश्वास होना चाहिए कि सच्चे दिल से की गई यह प्रार्थना अवश्य पूरी होगी और इसी विश्वास के साथ अपने काम में 
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हो भावना प्रधान
भावनाएं और प्रार्थना प्रार्थना हमेशा भावना के साथ होती है, सिर्फ किसी को दिखाने के लिए की गई प्रार्थना कभी भी फलीभूत नहीं हो सकती। इसलिए कभी भी बाहरी जगहों पर या दूसरों के सम्मुख बोलकर प्रार्थना ना करें। भावनाएं दिल से महसूस करने की चीज हैं, इसलिए मन ही मन शब्दों के साथ इसे पूरा करें।


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हिन्दू परिवार संघटन संस्था