Wednesday, 28 March 2018

पिछले तीन साल में पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों में नौकरी छोड़ने का ट्रेंड लगभग 4 गुना तक बढ़ गया है

3 साल में चार गुना बढ़ी नौकरी छोड़ने वाले जवानों की संख्या, 14,587 ये है

पिछले तीन साल में पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों में नौकरी छोड़ने का ट्रेंड लगभग 4 गुना तक बढ़ गया है. बेहतर करियर की चाह में पिछले 3 साल में 14,587 अधिकारियों और जवानों ने स्वैच्छा से अर्धसैनिक बलों की नौकरी छोड़ी है. 

सरकार रक्षा बजट में बढ़ोतरी कर रही है, देश की सुरक्षा में तैनात जवानों को बेहतर सुविधाएं दिए जाने का दावा किया जा रहा है. लेकिन, नौकरी छोड़ने वाले जवानों की बढ़ती संख्या कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. पिछले तीन साल में पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों में नौकरी छोड़ने का ट्रेंड लगभग 4 गुना तक बढ़ गया है. बेहतर करियर की चाह में पिछले 3 साल में 14,587 अधिकारियों और जवानों ने स्वैच्छा से अर्धसैनिक बलों की नौकरी छोड़ी है. यह आंकड़ा साल 2015 से 2017 का है.
गृह मंत्रालय की तरफ से जारी किए गए रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एसएसबी, सीआईएसएफ और असम राइफल के 14,587 जवानों और अधिकारियों ने स्वैच्छिक रिटायरमेंट लिया है. जबकि 2015 में यह आंकड़ा 3425 ही था. 
क्या कहते हैं आंकड़े
आंकड़ों को बारीकी से देखा जाए तो सीआरपीएफ और बीएसएफ के जवानों में नौकरी छोड़ने का ट्रेंड सबसे ज्यादा है. 2015 में सीआरपीएफ के 1376 जवानों ने नौकरी छोड़ी, जबकि 2017 में यह आंकड़ा बढ़कर 5123 पर पहुंच गया. यही हाल बीएसएफ के जवानों का भी रहा. आंकड़े बताते हैं कि 2015 में 909 बीएसएफ जवानों ने नौकरी छोड़ी, वहीं 2017 में यह आंकड़ा 6400 को पार कर गया.
सुरक्षा के लिहाज से अहम हैं सीआरपीएफ और बीएसएफ
आपको बता दें कि इन दोनों ही फोर्सज (सीआरपीएफ और बीएसएफ) को बॉर्डर पर सुरक्षा के साथ देश की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से भी बहुत अहम माना जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक बीएसफ पर बांग्लादेश और पाकिस्तान की सीमा से सटे इलाकों में देश की सुरक्षा का जिम्मा होता है. 2015 से 2017 के बीच 7324 लोगों ने बीएसएफ की नौकरी छोड़ दी. दूसरी तरफ देश की आंतरिक सुरक्षा खास तौर पर नक्सल प्रभावित और जम्मू-कश्मीर इलाकों में सुरक्षा का जिम्मा सीआरपीएफ के जवानों पर होता है. पिछले 3 साल में सीआरपीएफ के 6501 जवानों/अधिकारियों ने स्वैच्छा से रिटायरमेंट लिया.
ये हो सकता है कारण जवानों और अधिकारियों के नौकरी छोड़ने का ये सिलसिला 2024 तक जारी रहने वाला है. एक अधिकारी का कहना है कि बहुत से जवान और अधिकारी बेहतर करियर के लिए प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां तलाश रहे हैं. सिक्योरिटी एजेंसी और ऐसे दूसरे करियर विकल्प भी जॉब छोड़ने के कारणों में से एक हैं. 

Tuesday, 27 March 2018

विधायकों का वेतन तीन गुना किया गया

कर्ज में डूबे उत्तराखंड के मंत्रियों और विधायकों की बल्ले-बल्ले, दोगुनी हुई सैलरी



उत्तराखंड विधानसभा ने विधायकों के वेतन भत्तों में बढ़ोतरी को लेकर विविध संशोधन विधेयक पास कर दिया है. न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक विविध संशोधन विधेयक के पास होने से प्रदेश के विधायकों की सैलरी करीब 100 फीसदी तक बढ़ जाएगी.
देहरादून: उत्तराखंड विधानसभा ने विधायकों के वेतन भत्तों में बढ़ोतरी को लेकर विविध संशोधन विधेयक पास कर दिया है. न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक विविध संशोधन विधेयक (मिसलेनियस अमेंडमेंट बिल) के पास होने के बाद प्रदेश के विधायकों की सैलरी करीब 100 फीसदी तक बढ़ जाएगी. इस विधेयक को राज्य सरकार ने शनिवार (24 मार्च) को ही सदन में पेश किया था, जिसे बजट सत्र के आखिरी दिन पास कर दिया गया. विधायक लंबे समय से वेतन भत्ता बढ़ाने की मांग कर रहे थे. विधायकों की मांग पर तदर्थ समिति (एडहॉक कमेटी) का गठन किया गया था. विधानसभा से विधेयक पारित होने के बाद अब इसे राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा.
विधायकों का वेतन तीन गुना किया गया
विधायकों के वेतन 10 हजार रुपए से बढ़ाकर 30 हजार रुपए किया गया है. मंत्रियों के वेतन 45 हजार रुपए से बढ़ाकर 90 हजार रुपए किया गया है. स्पीकर का वेतन 55,000 हजार रुपए से बढ़ाकर 1.10 लाख रुपए किया गया है. डिप्टी स्पीकर की सैलरी भी दोगुनी कर दी गई है. खास बात ये ही विधायकों की सैलरी के साथ जुड़े भत्ते भी दोगुना से तीन गुणा तक बढ़ा दिए गए हैं.
उत्तराखंड के 51 विधायक करोड़पति
रिपोर्ट एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के मुताबिक उत्तराखंड के 69 में से 51 विधायक करोड़पति हैं. 51 करोड़पतियों में 10 करोड़ से अधिक संपत्ति वाले 5, 5-10 करोड़ की संपत्ति वाले 5 और 1-5 करोड़ की संपत्ति वाले 17  विधायक हैं.


इससे पहले 2014 में विजय बहुगुणा सरकार ने विधायकों की सैलरी बढ़ाई थी
इस कमेटी ने पिछले हफ्ते अपनी रिपोर्ट सदन में रखी थी. कैबिनेट की बैठक में भी वेतन भत्ते को बढ़ाने की मंजूरी मिल गई थी. कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद राज्य सरकार ने विधानसभा में विविध संशोधन विधेयक (मिसलेनियस अमेंडमेंट बिल) पेश किया, जिसे सदन से मंजूरी मिल गई. वर्तमान में उत्तराखंड में विधायकों की सैलरी करीब 1.6 लाख रुपए हर महीने है. स्पीकर और मंत्रियों की सैलरी तो इससे कही ज्यादा है. जनवरी 2014 में विजय बहुगुणा सरकार ने विधायकों के वेतन भत्तों में जबरदस्त बढ़ोतरी की थी. एकबार फिर त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार विधायकों और मंत्रियों की सैलरी बढ़ाने जा रही है.
सैलरी के अलावा ये सुविधाएं भी
विधायकों को सैलरी के अलावा कई तरह की सुविधाएं भी मिलती हैं. जानकारी के मुताबिक एक विधायक को एक साल में तीन लाख कूपन (रेल और हवाई) की मिलती है. विधायकों और उनके परिवारों को क्लास वन ऑफिसर की तरह चिकित्सा सुविधा. इसके अलावा दो मोबाइल फोन, एक टेलीफोन और मकान निर्माण और वाहन क्रय के लिए 8-8 लाख लोन की भी सुविधा है.

Wednesday, 21 March 2018

आज ही क्रूर हत्यारे नादिरशाह ने अपनी बर्बर सेना को दिया था दिल्ली के पुरुषों के नरसंहार और नारियो के बलात्कार का आदेश

22 मार्च- आज ही क्रूर हत्यारे नादिरशाह ने अपनी बर्बर सेना को दिया था दिल्ली के पुरुषों के नरसंहार और नारियो के बलात्कार का आदेश


भले ही आज मोब लिंचिंग और तमाम अन्य घटनाओं का दुष्प्रचार कर के हिन्दू समाज को सोची समझी साजिश के साथ बदनाम किया जा रहा हो लेकिन इतिहास बताता है कि हत्यारे कौन हैं , कौन हैं लुटेरे , किस ने माना इस भूमि को अपना और किस ने किया इसको पराया .. इन तमाम सवालों के जवाब अब तक जनता को मिल भी गये होते लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से एक ही परिवार के आस पास रख कर एक ही प्रकार की बदनामी करते रहने वालों को ये समझ में नहीं आया कि उन्होंने भारत की संस्कृति की जड पर वार किया है और महिमामंडित किया है उन कातिलों को जिन्होंने बहाया है भारत में भारत वालों का ही खून .आज है 22 मार्च .. ये वो दिन है जिस दिन खुलेआम एक उस लुटेरे और हत्यारे ने अपनी सेना को हिन्दुओ के नरसंहार का आदेश दिया था जिसके खिलाफ लिखने में हमारे तमाम तथाकथित इतिहासकार और सेकुलर जमात के बुद्धिजीवी न जाने क्यों शर्म जैसी महसूस करते हैं . वो दिन था 22 मार्च 1739 जब हत्यारे और धर्मांध नादिर शाह ने अपनी सेना को दिल्ली मे जनसंहार की इजाजत दी.. इसके साथ नारियो का बलात्कार भी हुआ और चौराहों पर कत्ल भी .. ये बलात्कार और कत्लेआम 58 दिनों तक चलता रहा और नादिरशाह की हत्यारी फ़ौज में एक भी ऐसा बुद्धिजीवी और सेकुलर नहीं था जो कम से कम एक बार इस क्रूर को इस नरसंहार को रोकने के लिए कह दे .इस लुटेरे क्रूर हत्यारे ने दिल्ली में प्रवेश तो 20 मार्च को ही कर लिया था . 20 मार्च 17३८ को दिल्ली मेें प्रवेश कर नादिरशाह ने 20000 के करीब लोगों का कत्ल कर दिया गया जो केवल अपनी क्रूरता का खौफ जताने के मकसद से था ..उसके बर्बर सैनिक राजधानी में घुस पड़े और उन्होंने लूटमार का बाज़ार गर्म कर दिया। उसके कारण दिल्ली के हज़ारों नागरिक मारे गये और वहाँ भारी लूट की गई। इस लूट में नादिरशाह को बेशुमार दौलत मिली थी। उसे 20 करोड़ की बजाय 30 करोड़ रुपया नक़द मिला। उसके अतिरिक्त ढेरो जवाहरात, बेगमों के बहुमूल्य आभूषण, सोने-चाँदी के अगणित वर्तमान तथा अन्य वेश-क़ीमती वस्तुएँ उसे मिली थीं। इनके साथ ही साथ दिल्ली की लूट में उसे कोहिनूर हीरा और शाहजहाँ का 'तख्त-ए-ताऊस' (मयूर सिंहासन) भी मिला था। वह बहुमूल्य मयूर सिंहासन अब भी ईरान में है या नहीं, इसका ज्ञान किसी को नहीं है। 

नादिरशाह के हाथ पड़ने वाली शाही हरम की सुंदरी बेगमों के अतिरिक्त मुहम्मदशाह की पुत्री 'शहनाज बानू' भी थी, जिसका विवाह उसने अपने पुत्र 'नसरूल्ला ख़ाँ' के साथ कर दिया। नादिरशाह प्राय: दो महीने तक दिल्ली में लूटमार करता रहा था। उसके कारण दिल्ली उजाड़ और बर्बाद सी हो गई थी। जब वह यहाँ से जाने लगा, तब करोड़ो की संपदा के साथ ही साथ वह 1,000 हाथी, 7,000 घोड़े, 10,000 ऊँट, 100 खोजे, 130 लेखक, 200 संगतराश, 100 राज और 200 बढ़ई भी अपने साथ ले गया था। नादिरशाह 17३८ में ईरान वापस गया और 17४६ में उसकी मृत्यु हो गई। अय्याशी और कुकर्म के प्रतीक रहे इस क्रूर लुटेरे और आक्रान्ता को अपने जीवन का अधिकतर समय हरम तथा हिजड़ों में बिताने तथा उसके असंयत और विलासी आचरण के कारण रंगीला कहा गया। सवाल ये है कि 58 दिन तक चले इस महापाप रूपी इतिहास को क्यों नहीं बताते मोब लिंचिंग का प्रचार करने वाले ? 

लिंगायतों का राजनैतिक रुझान -

कर्नाटक के लिंगायत विवाद पर देश की प्रतिक्रिया 


जैसे ही कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने लिंगायत समुदाय को हिन्दू धर्म से प्रथक धर्म घोषित किया गया, सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा | लोगों के गुस्से की बानगी देखिये -

हिन्दू द्रोही पार्टी का खात्मा कब होगा?

लिंगायत हिन्दू नही है 

अगला कदम मराठा हिन्दू नही है राजपूत हिन्दू नही है जाट हिन्दू नही है ये हिन्दू नही है वो हिन्दू नही है?

इस पार्टी को नष्ट होना ही होगा अब।

टुकड़ो के खातिर इसकी चमचागिरी करने वाले भी नष्ट होंगे।लिंगायत को अलग धर्म बनाकर हिन्दुओ को तोड़ने की कोशिश का जबरदस्त असर तय है।अभी तक तो ये आरक्षण के लॉलीपॉप से जातियो को लड़वाते थे अब ये हिन्दू नही होने का फतवा देने लगे है।

कांग्रेस ने लिंगायत समाज को हिन्दू से अलग धर्म बनाने का कानून पास किया है कर्नाटक में...

जल्द ही
ब्राह्मण कायस्थ नाई ठाकुर बनिया यादव जाट पाटीदार हरिजन धोबी को भी हिन्दू से अलग धर्म का घोषित कर देगी 2019 चुनाव जीतने के लिए। ये लोग हिन्दू जाति को अलग धर्म बनाने का प्रयास कर चुनाव जीत के सपने देख रहे हैं।

लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने दे दिया.
और राहुल गांधी ये दावा करते हैं कि हम बांटने की राजनीति नहीं करते. 😉😃
दम है तो अहमदिया और कादियान को अलग धर्म का दर्जा देकर दिखाएं.
बरेलवी मसलक को अलग माने,
देवबंदी को अलग.
शिया और सुन्नी को इस्लाम में ही
अलग दर्जा देकर दिखाएं.
सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि हिंदुत्व जीवन शैली है, मनोदशा है.
लेकिन समझे तो वो जो हिंदू हो. जिसका बपतिस्मा वेटिकन में हुआ हो, उसकी समझ से ये बाहर की बात है.
यूं भी कांग्रेस भारत को बांटने के बाद से सिर्फ बांटने का ही काम करती रही है.
अगड़े, पिछड़े, दलितों को बांटना.
भिंडरावाला को आगे लाकर सिखों को बांटना.
श्रीलंका में दखल देकर तमिलों को बांटना.
इधर राम मंदिर का ताला खुलवाना और उधर शाहबानो मामले में कानून बनाना, बांटना ही तो था.
राहुल गांधी भी अपने पापा और दादी के पदचिह्नों पर हैं.
गुजरात में पटेलों को बांटने की कोशिश.
अब राजस्थान में राजपूतों को बांटने की कोशिश.
महाराष्ट्र में दलितों को सुलगाने की कोशिश.
और अब तो हद हो गई, लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता देना. इसमें खास बात ये है कि ये राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात है.
खैर कांग्रेस को कानून, संविधान, परंपराओं, मर्यादा और क्षेत्राधिकार से कोई मतलब नहीं है. क्योंकि ये परिवार तो न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका, संविधान सबको अपनी जागीर मानता है.
लेकिन बाटने की मानसिकता वालों और उसके गुर्गों सुन लो. हिंदू नहीं बंटेगा. हिंदू के टुकड़े नहीं होंगे. इतिहास की किताब खोलकर देख लो, जिसने बांटने की कोशिश की है, टुकड़े-टुकड़े हो गया... 

और सबसे बेहतर प्रतिक्रिया है डॉक्टर डेविड फ्राले की - 

एक ओर तो कांग्रेस नेता राहुल गाँधी और शशि थरूर स्वयं को हिन्दू घोषित करते हैं, वहीं दूसरी ओर हिन्दू को विभिन्न सम्प्रदायों में बांटकर ईसाई मिशनरीयों की रणनीति का अनुशरण करते हैं | यह पांडवों जैसा नहीं, असुरों जैसा कृत्य है | 


आईये अब इस मामले की तह तक जाने की कोशिश करते हैं -

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने लिंगायत और वीरशैव लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक दर्जा देने की केंद्र से सिफारिश करने का फैसला किया है। इसके पूर्व राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस नागामोहन दास की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था, जिसने लिंगायत समुदाय के लिए अलग धर्म के साथ अल्पसंख्यक दर्जे की सिफारिश की थी | कर्नाटक सरकार ने नागमोहन समिति की सिफारिशों को स्टेट माइनॉरिटी कमीशन ऐक्ट की धारा 2डी के तहत मंजूर कर लिया |
ख़ास बात यह है कि राज्य सरकार इस मामले में स्वयं कुछ नहीं कर सकती, उसे अब ये सिफारिश केंद्र सरकार के पास भेजनी होगी और अंतिम निर्णय केंद्र सरकार ही करेगी |
स्मरणीय है कि बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय से आते हैं। यह समुदाय राज्य में संख्या बल के हिसाब से मजबूत और राजनीतिक रूप से काफी प्रभावशाली है। राज्य में लिंगायत/वीरशैव समुदाय की कुल आबादी में 17 प्रतिशत की हिस्सेदारी होने का अनुमान है। इन्हें कांग्रेस शासित कर्नाटक में बीजेपी का पारंपरिक वोट माना जाता है। 

किन्तु इस निर्णय का सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायत और वीरशैव दोनों समुदाय को अल्‍पसंख्‍यक समुदाय का दर्जा दिए जाने के लिए केंद्र सरकार से सिफारिश की है। जबकि इसके पूर्व तक स्वयं कांग्रेस के नेता और मंत्री अक्‍सर दोनों को अलग-अलग धर्म बताते रहे हैं। लेकिन यू टर्न लेकर राज्‍य सरकार ने वीरशैव को भी लिंगायत का हिस्‍सा बना दिया।' 

वीरशैवों का नेतृत्व करने वाले एक संत एवं बलेहोनुर स्थित रम्भापुरी पीठ के श्री वीर सोमेश्वर शिवाचार्य स्वामी ने कैबिनेट के इस फैसले की निंदा की है। उन्‍होंने आरोप लगाया कि कुछ लोगों की साजिश के बाद सिफारिश स्वीकार की गई लेकिन वीरशैव मिल कर इसके खिलाफ लड़ेंगे। 
आइए जानते हैं कि क्या है यह लिंगायत और वीरशैव प्रकरण - 
लिंगायत समाज मुख्य रूप से दक्षिण भारत में है. लिंगायत समाज को कर्नाटक की अगड़ी जातियों में गिना जाता है. कर्नाटक की जनसंख्या में लिंगायत और वीरशैव समुदाय की हिस्सेदारी करीब 18 प्रतिशत है. इस समुदाय को बीजेपी का परंपरागत वोटर माना जाता है. 

कौन हैं लिंगायत और क्या हैं इनकी परंपराएं? 

लिंगायत समाज को कर्नाटक की अगड़ी जातियों में गिना जाता है. कर्नाटक की आबादी का 18 फीसदी लिंगायत हैं. पास के राज्यों जैसे महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी लिंगायतों की अच्छी खासी आबादी है. 

लिंगायत और वीरशैव कर्नाटक के दो बड़े समुदाय हैं | इन दोनों समुदायों का जन्म 12वीं शताब्दी के समाज सुधार आंदोलन के परिणाम स्वरूप हुआ जिसका नेतृत्व समाज सुधारक बसवन्ना ने किया था, जो खुद ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे किन्तु जन्म आधारित व्यवस्था की जगह कर्म आधारित व्यवस्था में विश्वास करते थे | 

लिंगायत सम्प्रदाय के लोग मूर्ति पूजा तो नहीं करते, किन्तु एक अंडाकार "इष्टलिंग" को धागे से अपने शरीर पर बांधते हैं | लिंगायत इस इष्टलिंग को आंतरिक चेतना का प्रतीक मानते हैं और निराकार परमात्मा को मानव या प्राणियों के आकार में कल्पित न करके विश्व के आकार में इष्टलिंग को मानते हैं | 

लिंगायत पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करते हैं. लिंगायतों का मानना है कि एक ही जीवन है और कोई भी अपने कर्मों से अपने जीवन को स्वर्ग और नरक बना सकता है. 

लिंगायत में शवों को दफनाने की परंपरा 

लिंगायत परंपरा में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी अलग है. लिंगायत में शवों को दफनाया जाता है. लिंगायत परंपरा में मृत्यु के बाद शव को नहलाकर बिठा दिया जाता है. शव को कपड़े या लकड़ी के सहारे बांध जाता है. जब किसी लिंगायत का निधन होता है तो उसे सजा-धजाकर कुर्सी पर बिठाया जाता है और फिर कंधे पर उठाया जाता है. इसे विमान बांधना कहते हैं. कई जगहों पर लिंगायतों के अलग कब्रिस्तान होते हैं. 

वर्तमान में बसवन्ना के अनुयायियों की दो धाराएँ चल रही हैं | एक का मानना है कि इष्ट लिंग और भगवान बसवेश्वर के बताए गए नियम हिंदू धर्म से बिल्कुल अलग हैं जबकि अन्य लोग मानते हैं कि बसवन्ना का आंदोलन भक्ति आंदोलन की ही तरह था और उसका मकसद हिंदू धर्म से अलग होना नहीं था | 

आम मान्यता ये है कि वीरशैव और लिंगायत एक ही लोग होते हैं किन्तु वीरशैव शिव की मूर्ति पूजा भी करते हैं | भीमन्ना ऑल इंडिया वीरशैव महासभा के पूर्व अध्यक्ष भीमन्ना खांद्रे कहते हैं कि वीरशैव और लिंगायतों में कोई अंतर नहीं है |" 

कर्नाटक में लगभग 17 फीसदी लिंगायत को धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक का दर्जा देना एक लोलीपोप के समान है | कहा जा रहा है कि उन्हें अल्पसंख्यक आरक्षण का फायदा मिलेगा, किन्तु सवाल उठता है कि कैसे ? क्या अन्य अल्पसंख्यक समुदाय जैसे मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध और सिख, इसे आसानी से सहन कर लेंगे कि एक अगड़ी जाति उनके हक़ पर अधिकार जमाने आ जाए ? और प्रथक से देने का प्रयास किया तो कोर्ट बीच में आयेगा ही, जैसा कि अब तक होता आया है | कुल मिलाकर यह एक चुनावी शिगूफे के अलावा कुछ नहीं है | 

लिंगायतों का राजनैतिक रुझान - 

1980 के दशक में लिंगायतों ने राज्य के नेता रामकृष्ण हेगड़े पर भरोसा किया था | बाद में लिंगायत कांग्रेस के वीरेंद्र पाटिल के भी साथ गए | इसके बाद लिंगायत समुदाय ने फिर से कांग्रेस से दूरी बना ली और फिर से हेगड़े का समर्थन करने लगे | इसके बाद लिंगायतों ने बीजेपी के बीएस येदियुरप्पा को अपना नेता चुना, किन्तु जब बीजेपी ने येदियुरप्पा को सीएम पद से हटाया तो इस समुदाय ने बीजेपी से मुंह मोड़ लिया और नतीजा यह निकला कि कांग्रेस सत्ता में आ गई |

Friday, 16 March 2018

108 उपनिषदों की सूची

108 उपनिषदों की सूची
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ईशादि १०८ उपनिषदों की सूची –
१.ईश = शुक्ल यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
२.केन उपनिषद् = साम वेद, मुख्य उपनिषद्
३.कठ उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
४.प्रश्नि उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद्
५.मुण्डक उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद्
६.माण्डुक्य उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद्
७.तैत्तिरीय उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
८.ऐतरेय उपनिषद् = ऋग् वेद, मुख्य उपनिषद्
९.छान्दोग्य उपनिषद् = साम वेद, मुख्य उपनिषद्
१०.बृहदारण्यक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
११.ब्रह्म उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
१२.कैवल्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
१३.जाबाल उपनिषद् (यजुर्वेद) = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
१४.श्वेताश्वतर उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
१५.हंस उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद्
१६.आरुणेय उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
१७.गर्भ उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
१८.नारायण उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद्
१९.परमहंस उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
२०.अमृत-बिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
२१.अमृत-नाद उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
२२.अथर्व-शिर उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
२३.अथर्व-शिख उपनिषद् =अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
२४.मैत्रायणि उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
२५.कौषीतकि उपनिषद् = ऋग् वेद, सामान्य उपनिषद्
२६.बृहज्जाबाल उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
२७.नृसिंहतापनी उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
२८.कालाग्निरुद्र उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
२९.मैत्रेयि उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
३०.सुबाल उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३१.क्षुरिक उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
३२.मान्त्रिक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३३.सर्व-सार उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३४.निरालम्ब उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३५.शुक-रहस्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३६.वज्रसूचि उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
३७.तेजो-बिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
३८.नाद-बिन्दु उपनिषद् = ऋग् वेद, योग उपनिषद्
३९.ध्यानबिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४०.ब्रह्मविद्या उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४१.योगतत्त्व उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४२.आत्मबोध उपनिषद् = ऋग् वेद, सामान्य उपनिषद्
४३.परिव्रात् उपनिषद् (नारदपरिव्राजक) = अथर्व वेद, संन्यास उपनिषद्
४४.त्रिषिखि उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४५.सीता उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
४६.योगचूडामणि उपनिषद् = साम वेद, योग उपनिषद्
४७.निर्वाण उपनिषद् = ऋग् वेद, संन्यास उपनिषद्
४८.मण्डलब्राह्मण उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४९.दक्षिणामूर्ति उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
५०.शरभ उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
५१.स्कन्द उपनिषद् (त्रिपाड्विभूटि) = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
५२.महानारायण उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
५३.अद्वयतारक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
५४.रामरहस्य उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
५५.रामतापणि उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
५६.वासुदेव उपनिषद् = साम वेद, वैष्णव उपनिषद्
५७.मुद्गल उपनिषद् = ऋग् वेद, सामान्य उपनिषद्
५८.शाण्डिल्य उपनिषद् = अथर्व वेद, योग उपनिषद्
५९.पैंगल उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
६०.भिक्षुक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
६१.महत् उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
६२.शारीरक उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
६३.योगशिखा उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
६४.तुरीयातीत उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
६५.संन्यास उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
६६.परमहंस-परिव्राजक उपनिषद् = अथर्व वेद, संन्यास उपनिषद्
६७.अक्षमालिक उपनिषद् = ऋग् वेद, शैव उपनिषद्
६८.अव्यक्त उपनिषद् = साम वेद, वैष्णव उपनिषद्
६९.एकाक्षर उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
७०.अन्नपूर्ण उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
७१.सूर्य उपनिषद् = अथर्व वेद, सामान्य उपनिषद्
७२.अक्षि उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
७३.अध्यात्मा उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
७४.कुण्डिक उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
७५.सावित्रि उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
७६.आत्मा उपनिषद् = अथर्व वेद, सामान्य उपनिषद्
७७.पाशुपत उपनिषद् = अथर्व वेद, योग उपनिषद्
७८.परब्रह्म उपनिषद् = अथर्व वेद, संन्यास उपनिषद्
७९.अवधूत उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
८०.त्रिपुरातपनि उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
८१.देवि उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
८२.त्रिपुर उपनिषद् = ऋग् वेद, शाक्त उपनिषद्
८३.कठरुद्र उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
८४.भावन उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
८५.रुद्र-हृदय उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
८६.योग-कुण्डलिनि उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
८७.भस्म उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
८८.रुद्राक्ष उपनिषद् = साम वेद, शैव उपनिषद्
८९.गणपति उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
९०.दर्शन उपनिषद् = साम वेद, योग उपनिषद्
९१.तारसार उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद्
९२.महावाक्य उपनिषद् = अथर्व वेद, योग उपनिषद्
९३.पञ्च-ब्रह्म उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
९४.प्राणाग्नि-होत्र उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
९५.गोपाल-तपणि उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
९६.कृष्ण उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
९७.याज्ञवल्क्य उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
९८.वराह उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
९९.शात्यायनि उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
१००.हयग्रीव उपनिषद् (१००) = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
१०१.दत्तात्रेय उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
१०२.गारुड उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
१०३.कलि-सन्तारण उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद्
१०४.जाबाल उपनिषद् (सामवेद) = साम वेद, शैव उपनिषद्
१०५.सौभाग्य उपनिषद् = ऋग् वेद, शाक्त उपनिषद्
१०६.सरस्वती-रहस्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शाक्त उपनिषद्
१०७.बह्वृच उपनिषद् = ऋग् वेद, शाक्त उपनिषद्
१०८.मुक्तिक उपनिषद् (१०८) = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद।


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Tuesday, 13 March 2018

2018 में रामनवमी कब है ?जानिए रामनवमी का शुभ मुहूर्त

आदि राम तपोवनादि गमनंहत्वा मृगं कांचनम्।
वैदीहीहरणं जटायुमरणंसुग्रीवसंभाषणम्।।
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणंलंकापुरीदाहनम्।
पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्एतद्धि रामायणम्।।

रामनवमी का मुहूर्त
रामनवमी मुहूर्त : 11:14:04 से 13:41:03 तक
अवधि : 2 घंटे 26 मिनट रामनवमी,मध्याह्न समय : 12:27:33 मिनट तक
जय श्री राम,हमारे देश में रामनवमी का पावन और पवित्र त्योहार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मनाई जाती है।जैसा कि हम सब जानते हैं कि भगवान विष्णु के 7वें अवतार प्रभु श्रीराम थे।हर वर्ष हिन्दू कैंलेडर के अनुसार चैत्र मास की नवमी तिथि को श्रीराम नवमी देश भर में हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है और चैत्र मास की प्रतिपदा से लेकर नवमी तक शक्ति की आराधना और सादना का महापर्व नवरात्रि भी मनाई जाती है। इस पावन अवसर पर भक्त श्रद्धालु व्रत रखते हुए जागरण और मां दुर्गा की पूजा करते हैं ।

रामनवमी उत्सव का हर्षोल्लास
हमारे देश में हिन्दू मतावलम्बी श्री रामनवमी का त्योहार सच्ची श्रद्धा के साथ मनाते हैं वहीं वैष्णव संप्रदाय और संत समाज इस खास अवसर पर विशेष पूजा अर्चना और साधना में समय व्यतित करता है ।
रामनवमी के विशेष अवसर पर भक्तगण श्रीरामचरितमानस का पाठ,  रामरक्षा स्त्रोत का पाठ, भजन-कीर्तन के साथ ही भगवान राम की मूर्ति को फूल-माला से सजाते हैं और घर में स्थापित करते हैं। सात ही  भगवान राम की मूर्ति को पालने में झुलाते हैं

जानिए राम नवमी की सरल पूजा विधि
रामनवमी के विशेष अवसर पर प्रात: सबसे पहले स्नान करके पवित्र होकर पूजा स्थल पर पूजन सामग्री के साथ हमें बैठना चाहिए,  पूजा में तुलसी दल और कमल का फूल अवश्य रखना चाहिए,और फिर श्रीराम नवमी की पूजा षोडशोपचार विधि से करें, सात ही खीर और फल-मूल को प्रसाद के रूप में तैयार करें।  पूजा संपन्न होने के बाद घर की सबसे छोटी महिला परिवार कुटुंब के सभी लोगों के माथे पर तिलक लगाए और प्रसाद ग्रहण करें।

श्रीरामनवमी के संबंध में हिन्दू धार्मिक पौराणिक मान्यताएँ
जैसा कि हमारे धर्मशास्त्रों में वर्णित है,उसके अनुसार श्री रामनवमी की कहानी लंकापति रावण से शुरू होती है।राक्षसराज रावण के राज में जब आम जन और संत त्राहिमाम करने लगे,देवगण परेशान हो गए तब प्रार्थना करने के लिए भगवान विष्णु के पास गए।और फिर राक्षसों का विनाश और संहार करने के लिए,मानव जाति,धर्म की रक्षा करने के लिए चक्रवर्ती नरेश, महान प्रतापी महाराज दशरथ और मैया कौशल्या की कोख से भगवान विष्णु ने राम के रूप में अवतार लिया। तभी से चैत्र नवमी तिथि को रामनवमी के रूप में बड़े ही धूमधाम से मनाने की परंपरा प्रारंभ। ऐसा कहा जाता है कि नवमी के दिन ही गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने श्रीरामचरित मानस की रचना भी प्रारंभ की थी।

Monday, 12 March 2018

आज भारत जैसे देश में जहां हिन्दुओं की एक बड़ी आबादी रहती है वे ही इस भाषा व संस्कृति को भूलते जा रहे हैं तथा पश्चिमी भाषा, संस्कृति व सभ्यता को अपनाने की ओर अपना झुकाव बढ़ा रहे हैं।

हिंदू धर्म के इन तथ्यों से अनजान हैं अधिकांश भारतीय


पूर्ण जानकारी का महत्व

जब हमें किसी विषय की पर्याप्त जानकारी नहीं होती तो हम कही-सुनी बातों पर भी विश्वास करने लगते हैं। उसी जानकारी के आधार पर विभिन्न निष्कर्षों पर भी आते हैं लेकिन किसी विषय का सार निकालने से पहले हमें उसकी पूर्ण नहीं तो पर्याप्त जानकारी होनी बेहद जरूरी है।

धर्म

धर्म एक ऐसा विषय है जिसकी अधूरी जानकारी के आधार पर लोग छोटी सी बात को भी बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। एक झूठ को सच साबित करने में लगे रहते हैं और विभिन्न अंधविश्वासों को धार्मिक विश्वास की मान्यता देते हैं।

अनजाने तथ्य

इस आर्टिकल में हिन्दू धर्म से जुड़े कुछ ऐसे ही तथ्य हैं जिनसे आज भी मनुष्य अनजान है। और अगर जानकारी रखता भी है तो अधूरी या फिर गलत, जो इस धर्म को गलत राह पर ले जाने के लिए प्रेरित कर रही है।


हिन्दू धर्म का सिद्धांत

किसी का कहना है कि हिन्दू धर्म बहुदेववादी तरीके का पालन करता है, तो किसी का मानना है कि यह धर्म एकेश्वरवादी सिद्धांत से बना है। लेकिन तथ्यों की मानें तो हिन्दू धर्म इन सभी सिद्धातों से पूरित है।

मार्ग अनेक

यह एक ऐसा धर्म है जो किसी को एक सिद्धांत में नहीं बांधता। हिन्दू धर्म का मानना है कि ईश्वर तक पहुंचने के साधन काफी सारे हैं लेकिन परिणाम एक ही है। इसलिए दुनिया को ‘भगवान’ का नाम देने वाले इस धर्म में अनेक देवी-देवताओं को पूजा जाता है।



चार वेद

हिन्दू धर्म के चार वेद – ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद तथा यजुर्वेद, सभी वेद अपने आप में आज भी मनुष्य का मार्गदर्शन करते हैं। हिन्दू धर्म के अनुयायी इन सभी वेदों एवं पौराणिक ग्रंथों को अपना गुरु रूप मानकर अपनी कठिनाइयों का समाधान पाते हैं।


महान ग्रंथ

हिन्दू धर्म के दो महान ग्रंथ- रामायण एवं महाभारत, स्वयं मनुष्य को धर्म के मार्ग पर चलना सिखाते हैं। परन्तु आज का आधुनिक मनुष्य इन सिद्धांतों को खुद पर कितना लागू करता है यह एक अलग बात है।

शक्ति की प्रतीक देवी

आजकल लोग स्त्री को अपने बराबर समझें या ना समझें, लेकिन हिन्दू धर्म ने हमेशा से ही स्त्री रूपी ‘शक्ति’ को देवों के समान महान माना है। हिन्दू धर्म की त्रिमूर्ति हैं ब्र्ह्मा, विष्णु एवं महेश (शिव)। भगवान ब्रह्मा जहां सृष्टि की संरचना के लिए पुराणों में उल्लिखित हैं वहीं विष्णुजी को इस संसार का पालनहार माना गया है।

हिन्दू धर्म की त्रिमूर्ति

तथा भगवान शिव भक्तों की इच्छाओं को पूरित करने एवं अपने रौद्र रूप से बुरे प्रभाव को नष्ट करने के लिए जाने जाते हैं। लेकिन हिन्दू धर्म ने एक देवी को हमेशा ही शक्ति का प्रतीक माना है।

प्रत्येक देवी का शक्ति रूप

वह देवी चाहे कोई भी हो, मां लक्ष्मी, माता पार्वती, मां दुर्गा या इनका कोई स्वरूप। प्रत्येक देवी को एक शक्ति के रूप में प्रकट किया गया है जो पापियों का संहार करने के लिए हमेशा ही मौजूद हैं।

सबसे पुराना धर्म

यदि हिन्दू धर्म को अन्य विश्व प्रसिद्ध धर्मों से तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो यह दुनिया के सबसे पुराने धर्म में गिना जाता है। लेकिन यदि आप हिन्दू धर्म के किसी अनुयायी से ऐसा ही कोई प्रश्न करें कि हिन्दू धर्म कितना पुराना है तो वह इसकी गणना लाखों या करोड़ों वर्ष पुरानी भी दे सकता है।

हिन्दू धर्म का समय चक्र

क्योंकि हिन्दू धर्म में समय का चक्र अन्य धर्मों के समय चक्र से काफी भिन्न है। भगवान ब्रह्मा ने समय को ‘कल्प’ के रूप में प्रदर्शित किया था और इस प्रत्येक कल्प में 14 ‘मनवंतरों’ को शामिल किया गया है।

कल्प से बना मनवंतर

इस गणना के अनुसार हम युगों के जाल को पार करते हुए आज केवल सातवें मनवंतर (वैवस्वत) तक ही पहुंच पाए हैं। लेकिन आम मनुष्य केवल युगों को चार विभाजन में पाता है – सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग एवं कलियुग।

चार युगों में विभाजन

और खुद को आज का मनुष्य कलियुग का भाग मानता है, जो कि धार्मिक संरचना के अनुसार दैत्यों का संसार कहा जाता है। केवल यही नहीं, ऐसे कई तथ्य हैं जो हिन्दू धर्म को अन्य धर्म से काफी भिन्न बताते हैं।

धन एक पाप?

कुछ धर्मों के अनुसार ‘पैसे’ को पाप के रूप में परिवर्तित किया जाता है। धन के पीछे पड़ना पाप के समान माना जाता है लेकिन दूसरी ओर हिन्दू धर्म स्वयं में ही धर्म को धन से भी जोड़ता है।

धन तथा समृद्धि की देवी

धन तथा स्मृद्धि के देवी-देवता इस बात का उदाहरण है कि हिन्दू धर्म में धन एवं सम्पदा की रवायत वर्षों पुरानी है। धन की देवी लक्ष्मी तथा धनकुबेर को लोग धन पाने के लिए रोज़ाना पूजते हैं।

धन के देवी-देवताओं का पूजन

विधि पूर्वक उनकी पूजा करते हैं तथा उनके मंत्रों का जाप करते हैं ताकि यह देव उन्हें आशीर्वाद प्रदान कर उनके जीवन पर छायी कंगाली के प्रभाव को दूर कर सकने में सहायक साबित हों।

तीसरा सबसे विशाल धर्म

हिन्दू धर्म एक ऐसा धर्म है जो विश्व भर में सबसे बड़े धर्मों में से तीसरे स्थान पर आता है लेकिन इसी धर्म की 95 प्रतिशत जनसंख्या एक देश, एक राष्ट्र ‘भारत’ को बनाती है।

संस्कृत का महत्व

इसके बावजूद भी विश्व भर में इस धर्म को जाना जाता है। ना केवल धार्मिक कथनों बल्कि हिन्दू धर्म को दुनिया भर में प्रस्तुत करने वाली भाषा ‘संस्कृत’ ने भी विश्व भर की अन्य भाषाओं को विकसित करने या फिर कुछ भाषाओं की प्रसिद्ध नामावलियों को रचने का प्रेरणात्मक श्रेय पाया है।

परंतु हिन्दू ही बन रहा पाश्चात्य सभ्यता का पुजारी


लेकिन इसके बावजूद भी आज भारत जैसे देश में जहां हिन्दुओं की एक बड़ी आबादी रहती है वे ही इस भाषा व संस्कृति को भूलते जा रहे हैं तथा पश्चिमी भाषा, संस्कृति व सभ्यता को अपनाने की ओर अपना झुकाव बढ़ा रहे हैं।

Sunday, 11 March 2018

मनु स्मृति के अनुसार

मनु स्मृति – इन 15 लोगों के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए


मनु स्मृति –

कुछ लोग होते हैं जो छोटी-छोटी बातों पर किसी से भी विवाद कर लेते हैं। वह ऐसा जान-बूझकर नहीं करते बल्कि उनका स्वभाव ही ऐसा होता है। मनु स्मृति के अनुसार 15 लोग ऐसे बताए गए हैं, जिनसे कभी विवाद नहीं करना चाहिए।
ये 15 लोग इस प्रकार हैं-

1. यज्ञ करने वाला

यज्ञ करने वाला ब्राह्मण सदैव सम्मान करने योग्य होता है। यदि उससे किसी प्रकार की कोई चूक हो जाए तो भी उसके साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि आप ऐसा करेंगे तो इससे आपकी प्रतिष्ठा ही धूमिल होगी। अतः यज्ञ करने वाले वाले ब्राह्मण से वाद-विवाद न करने में ही भलाई है।

2. पुरोहित

यज्ञ, पूजन आदि धार्मिक कार्यों को संपन्न करने के लिए एक योग्य व विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त किया जाता है, जिसे पुरोहित कहा जाता है। भूल कर भी कभी पुरोहित से विवाद नहीं करना चाहिए। पुरोहित के माध्यम से ही पूजन आदि शुभ कार्य संपन्न होते हैं, जिसका पुण्य यजमान (यज्ञ करवाने वाला) को प्राप्त होता है। पुरोहित से वाद-विवाद करने पर वह आपका काम बिगाड़ सकता है, जिसका दुष्परिणाम यजमान को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए पुरोहित से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

3. आचार्य

प्राचीनकाल में उपनयन संस्कार के बाद बच्चों को शिक्षा के लिए गुरुकुल भेजा जाता था, जहां आचार्य उन्हें पढ़ाते थे। वर्तमान में उन आचार्यों का स्थान स्कूल टीचर्स ने ले लिया है। मनु स्मृति के अनुसार आचार्य यानी स्कूल टीचर्स से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। वह यदि दंड भी दें तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। आचार्य (टीचर्स) हमेशा अपने छात्रों का भला ही सोचते हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर विद्यार्थी का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।

4. अतिथि

हिंदू धर्म में अतिथि यानी मेहमान को भगवान की संज्ञा दी गई है इसलिए कहा जाता है मेहमान भगवान के समान होता है। उसका आवभगत ठीक तरीके से करनी चाहिए। भूल से भी कभी अतिथि के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। अगर कोई अनजान व्यक्ति भी भूले-भटके हमारे घर आ जाए तो उसे भी मेहमान ही समझना चाहिए और यथासंभव उसका सत्कार करना चाहिए। अतिथि से वाद-विवाद करने पर आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस लग सकती है।

5. माता

माता ही शिशु की सबसे प्रथम शिक्षक होती है। माता 9 महीने शिशु को अपने गर्भ में धारण करती है और जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाती है। यदि वृद्धावस्था या इसके अतिरिक्त भी कभी माता से कोई भूल-चूक हो जाए तो उसे प्यार से समझा देना चाहिए न कि उसके साथ वाद-विवाद करना चाहिए। माता का स्थान गुरु व भगवान से ही ऊपर माना गया है। इसलिए माता सदैव पूजनीय होती हैं। अतः माता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

6. पिता

पिता ही जन्म से लेकर युवावस्था तक हमारा पालन-पोषण करते हैं। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पिता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। पिता भी माता के ही समान पूज्यनीय होते हैं। हम जब भी किसी मुसीबत में फंसते हैं, तो सबसे पहले पिता को ही याद करते हैं और पिता हमें उस समस्या का समाधान भी सूझाते हैं। वृद्धावस्था में भी पिता अपने अनुभव के आधार पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए पिता के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

7. मामा आदि संबंधी

मामा आदि संबंधी जैसे- काका-काकी, ताऊ-ताईजी, बुआ-फूफाजी, ये सभी वो लोग होते हैं, जो बचपन से ही हम पर स्नेह रखते हैं। बचपन में कभी न कभी ये भी हमारी जरूरतें पूरी करते हैं। इसलिए ये सभी सम्मान करने योग्य हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर समाज में हमें सभ्य नहीं समझा जाएगा और हमारी प्रतिष्ठा को भी ठेस लग सकती है। इसलिए भूल कर भी कभी मामा आदि सगे-संबंधियों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति बने तो भी समझा-बूझाकर इस मामले को सुलझा लेना चाहिए।

8. भाई

हिंदू धर्म के अनुसार बड़ा भाई पिता के समान तथा छोटा भाई पुत्र के समान होता है। बड़ा भाई सदैव मार्गदर्शक बन कर हमें सही रास्ते पर चलने के प्रेरित करता है और यदि भाई छोटा है तो उसकी गलतियां माफ कर देने में ही बड़प्पन है। विपत्ति आने पर भाई ही भाई की मदद करता है। बड़ा भाई अगर परिवार रूपी वटवृक्ष का तना है तो छोटा भाई उस वृक्ष की शाखाएं। इसलिए भाई छोटा हो या बड़ा उससे किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

9. बहन

भारतीय सभ्यता में बड़ी बहन को माता तथा छोटी बहन को पुत्री माना गया है। बड़ी बहन अपने छोटे भाई-बहनों को माता के समान ही स्नेह करती है। संकट के समय सही रास्ता बताती है। छोटे भाई-बहनों पर जब भी विपत्ति आती है, बड़ी बहन हर कदम पर उनका साथ देती है। छोटी बहन पुत्री के समान होती है। परिवार में जब भी कोई शुभ प्रसंग आता है, छोटी बहन ही उसे खास बनाती है। छोटी बहन जब घर में होती है तो घर का वातावरण सुखमय हो जाता है। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि बहन के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

10. पुत्र

हिंदू धर्म ग्रंथों में पुत्र को पिता का स्वरूप माना गया है यानी पुत्र ही पिता के रूप में पुनः जन्म लेता है। शास्त्रों के अनुसार पुत्र ही पिता को पुं नामक नरक से मुक्ति दिलाता है। इसलिए उसे पुत्र कहते हैं-
पुं नाम नरक त्रायेताति इति पुत्रः
पुत्र द्वारा पिंडदान, तर्पण आदि करने पर ही पिता की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। पुत्र यदि धर्म के मार्ग पर चलने वाला हो तो वृद्धावस्था में माता-पिता का सहारा बनता है और पूरे परिवार का मार्गदर्शन करता है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पुत्र से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

11. पुत्री

भारतीय संस्कृति में पुत्री को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। कहते हैं कि भगवान जिस पर प्रसन्न होता है, उसे ही पुत्री प्रदान करता है। संभव है कि पुत्र वृद्धावस्था में माता-पिता का पालन-पोषण न करे, लेकिन पुत्री सदैव अपने माता-पिता का साथ निभाती है। परिवार में होने वाले हर मांगलिक कार्यक्रम की रौनक पुत्रियों से ही होती है। विवाह के बाद भी पुत्री अपने माता-पिता के करीब ही होती है। इसलिए पुत्री से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

12. पत्नी

हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पति के शरीर का आधा अंग। किसी भी शुभ कार्य व पूजन आदि में पत्नी का साथ में होना अनिवार्य माना गया है, उसके बिना पूजा अधूरी ही मानी जाती है। पत्नी ही हर सुख-दुख में पति का साथ निभाती है। वृद्धावस्था में यदि पुत्र आदि रिश्तेदार साथ न हो तो भी पत्नी कदम-कदम पर साथ चलती है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पत्नी से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

13. पुत्रवधू

पुत्र की पत्नी को पुत्रवधू कहते हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार पुत्रवधू को भी पुत्री के समान ही समझना चाहिए। पुत्रियों के अभाव में पुत्रवधू से ही घर में रौनक रहती है। कुल की मान-मर्यादा भी पुत्रवधू के ही हाथों में होती है। परिवार के सदस्यों व अतिथियों की सेवा भी पुत्रवधू ही करती है। पुत्रवधू से ही वंश आगे बढ़ता है। इसलिए यदि पुत्रवधू से कभी कोई चूक भी हो जाए तो भी उसके साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

14. गृह सेवक यानी नौकर

मनु स्मृति के अनुसार गृह सेवक यानी नौकर से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि पुराने सेवक आपकी व आपके परिवार की कई गुप्त बातें जानता है। वाद-विवाद करने पर वह गुप्त बातें सार्वजनिक कर सकता है। जिससे आपके परिवार की प्रतिष्ठा खराब हो सकती है। इसलिए नौकर से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

15. दामाद

पुत्री के पति को दामाद यानी जमाई कहते हैं। धर्म ग्रंथों में दामाद को भी पुत्र के समान माना गया है। पुत्र के न होने पर दामाद ही उससे संबंधित सभी जिम्मेदारी निभाता है तथा ससुर के उत्तर कार्य (पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध आदि) करने का अधिकारी भी होता है। दामाद से इसलिए भी विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर आपकी पुत्री के दांपत्य जीवन पर भी पढ़ सकता है।
श्लोक :
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः।
बालवृद्धातुरैर्वैधैर्ज्ञातिसम्बन्धिबांन्धवैः।।
मातापितृभ्यां यामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया।
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत्।।

अथार्त- 1. यज्ञ करने वाले, 2. पुरोहित, 3. आचार्य, 4. अतिथियों, 5. माता, 6. पिता, 7. मामा आदि संबंधियों, 8. भाई, 9. बहन, 10. पुत्र, 11. पुत्री, 12. पत्नी, 13. पुत्रवधू, 14. दामाद तथा 15. गृह सेवकों यानी नौकरों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

मनुस्मृति में इसका जिक्र एक श्लोक के माध्यम से किया गया है

इन 8 लोगों से कभी ना करें मुकाबला, हमेशा होगी हार

जीवन जीने का सबसे सरल और आदर्श तरीका क्या है, इसे कोई भी नहीं कह सकता। अलग-अलग परिस्थितियों और लोगों के साथ यह अलग-अलग हो सकता है, एक ही चीज और काम अलग-अलग हालातों में सही या गलत हो सकते हैं। पर कैसे जानें कि कब क्या सही है और क्या गलत? इसी उहापोह में कई बार ऐसे काम भी कर जाते हैं जिसके लिए बाद में पछताते हैं। उस वक्त आपको सबसे बड़ा दुख इस बात का होता है कि काश, यह बात पहले समझ आ जाती!
हालांकि जीवन एक अनंत बढ़ती नदी की तरह है जिसकी राह में कुछ भी आए, वह बढ़ती रहती है। नदी को जिधर रास्ता मिल जाए, वह उसी ओर बह जाती है, लेकिन अपनी गति और अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए इसके कुछ रास्ते पहले से तय होते हैं। समय-समय पर अचानक आए कुछ बदलावों, राह की बड़ी परेशानियों के साथ यह अपने मार्ग में कई बार बदलाव भी करती है, लेकिन उसकी पहचान अपने पूर्व-प्रशस्त मार्ग से ही होती है।



जीवन भी बहुत हद तक इस नदी की तरह ही है, अगले पल सब कुछ सामान्य रह सकता है लेकिन यह भी संभव है कि कुछ ऐसा हो जाए जो आपके जीने की दिशा ही बदल दे। जिस प्रकार नदी अपनी राह में आने वाले छोटे कंक्रीट और पत्थरों के लिए हमेशा तैयार रहती है, उसी प्रकार जीवन में कुछ समान्य बाधाओं के लिए हमेशा सचेत रहना चाहिए। पर नदी को पता है कि बड़े पत्थर और पहाड़ों के सामने आने से उसे अपना रास्ता बदल लेना है। इस प्रकार उसका अस्तित्व अपनी पहचान के साथ बना रहता है लेकिन अगर वह ऐसा नहीं करती है तो शाखाओं में बंटकर अपनी पहचान खो सकती है।
इसी प्रकार जीवन में कुछ ऐसी बाधाएं और और कुछ ऐसे नियम हैं जिनके लिए मनुष्य को हमेशा सचेत रहना चाहिए। इन बाधाओं के प्रति अपना एक निर्धारित रुख अपनाते हुए तथा नियमों का ईमानदारी पूर्वक पालन करते हुए आप बेवजह की परेशानियों में उलझकर अपनी पहचान खोने से बच सकते हैं। इसी संदर्भ में मनुस्मृति में राह चलते हुए 8 खास जातकों की चर्चा की गयी है जिनके लिए आपको सदैव ही अपना मार्ग छोड़ देना चाहिए या कहें रास्ता पार करने के लिए उन्हें वरीयता देते हुए पहले उनके गुजरने का इंतजार करें, तभी स्वयं आगे बढ़ें। मनुस्मृति में इसका जिक्र एक श्लोक के माध्यम से किया गया है जो इस प्रकार है - “चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः। स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च।।
अर्थात् मार्ग में चलते हुए अगर आपके सामने रथ पर सवार व्यक्ति, रोगी, स्त्री, वृद्ध, बोझ उठाये व्यक्ति, स्नातक (ज्ञानी), राजा और वर आएं, तो हमेशा ही उसे मार्ग दे देना चाहिए। ऐसा ना करना स्वयं के जीवन के लिए परेशानियां खड़ी करने के समान है। पर इसकी एक खास वजह है, आगे हम क्रमवार इसकी चर्चा कर रहे हैं....
रथ: रथ हमेशा आपसे ऊंचा होगा। अगर उसपर सारथी हुआ तो संभव है कि वह रुककर आपको रास्ता दे दे, लेकिन अगर उसपर राजा समान व्यक्ति हुआ या घोड़ा लगाम से बाहर हुआ तो वह आपके लिए नहीं रुकेगा और आपका जीवन खतरे में पड़ सकता है। हालांकि आज के संदर्भ में बात करें तो रथ की तुलना कार और बस से की जा सकती है और घोड़ों की जगह ब्रेक को समझा जा सकता है। साफ शब्दों में आज के परिपेक्ष्य में अगर माना जाए, तो राह चलते हुए वाहनों को रोककर आगे बढ़ना शास्त्र-सम्मत भी नहीं है, इसलिए ऐसा करने से बचें।
वृद्ध: बड़े-बुजुर्ग हमेशा ही सम्माननीय माने गए हैं, इसलिए चाहे आप कितनी भी जल्दी में हों लेकिन अगर आपके सामने कोई वृद्द्ध महिला-पुरुष आ जाएं तो आप रुककर उन्हें अवश्य ही मार्ग दें या आगे बढ़ने के लिए उन्हें रास्ता दें। शास्त्रों में जहां बड़ों का सम्मान ना करने वाला ‘हेय (तुच्छ)’ मनुष्य माना गया है, वहीं ज्योतिष शास्त्र में इसे सूर्य को कमजोर करने का कारक माना गया है जो मनुष्य को अवनति की ओर धकेलता है। ऐसा व्यक्ति कभी भी सम्मानजनक और खुशहाल जीवन नहीं जी पाता।
रोगी: राह में किसी भी प्रकार का बीमार व्यक्ति मिले, उसे मार्ग अवश्य देना चाहिए। आपको नहीं पता कि उसके रोग की अवस्था क्या है। हो सकता है कि वह इतना अधिक बीमार हो कि थोड़ी भी देर होने पर उसकी जान पर बन आए। ऐसे में आप पाप के भागीदार होंगे।
बोझ उठाए व्यक्ति: मानवता हर मनुष्य का पहला धर्म और प्रथम कर्त्तव्य है। शरीर पर बोझ उठाकर चल रहा व्यक्ति आपकी अपेक्षा अधिक कष्ट में होगा, इसलिए उसे राह देकर उसे गंतव्य तक पहुंचने में आप उसकी मदद करते हैं। यही आपका नैतिक धर्म भी है और इंसानियत भी, यही शास्त्र सम्मत भी है। ऐसा ना करके कहीं ना कहीं आप इंसानियत के धर्म को अनदेखा कर शास्त्रों की भी अवहेलना कर रहे हैं जो आपको पाप और कष्ट पाने का भागीदार बनाता है।
स्त्री: हिंदू शास्त्रों में स्त्रियों को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है, इसलिए जिस भी प्रकार से हो इनका सम्मान करना आपको हमेशा ही मां लक्ष्मी के साथ ही सरस्वती की कृपा का पात्र भी बनाता है। ऐसे मनुष्य जीवन में हर खुशी पाते हैं, साथ ही धन-वैभव समेत हर वो चीज पाते हैं जिसकी उन्हें चाह होती है। इसलिए जब भी कोई स्त्री दिखे तो उसे सम्मान देते हुए हमेशा ही उसे रास्ता पहले पार करने दें।
स्नातक (ज्ञानी): यहां ‘स्नातक’ से अर्थ ज्ञानी या विद्वान पुरुष या स्त्रियों से हैं। ज्ञान ही मनुष्यता और धर्म का भाव लाता है, अत: जो ज्ञानी है वह हमेशा ही सम्माननीय है। इसलिए जब भी रास्ते में चलते हुए आपके सम्मुख कोई ज्ञानी पुरुष या महिला आए तो उसे सम्मान देते हुए हमेशा ही उनका मार्ग छोड़कर पीछे हट जाएं। इससे उनका आशीर्वाद आपको मिलेगा और हो सकता है भविष्य में अपने ज्ञान के प्रकाश से वो आपकी सफलता की राहें भी आपको दिखा दें।
राजा: हालांकि आज के संदर्भ में यह राजनेता हो सकते हैं, किंतु यहां ‘राजा’ से संदर्भ है ‘आपका पालन-पोषण करने वाला’। वह नीति-निर्माता और नीति-निर्देशक भी होता है, इसलिए एक प्रकार से वही आपके जीवन की डोर होता है। उसके बिना आप एक अच्छा जीवन जीने की आप नहीं सोच सकते। इसका तात्पर्य परिवार के मुखिया या जो भी अभिभावक हों उनसे भी हो सकता है। ऐसे लोगों को सम्मान देना आपको हमेशा उनका कृपापात्र बनाए रखेगा जो आपके सफल और सुखी जीवन के लिए बेहद आवश्यक है।
वर: हिंदू शास्त्रों में वर या विवाह के लिए जा रहे पुरुषों को भगवान शिव का प्रतीक माना गया है। इसलिए जब भी ये आपको राह में मिल जाएं, इनका रास्ता रोककर आगे बढ़ने की कोशिश ना करें, बल्कि इन्हें आगे जाने दें।