Saturday, 1 September 2018

अपने कड़वे प्रवचनों के जरिये शिराओं में बर्फ हो चुके रक्त को राष्ट्रभक्ति व धर्म अनुराग का लावा बनकर प्रवाहित कराने वाले जैन मुनि तरुण सागर जी हुए देवलोकवासी

कड़वे प्रवचन देने वाले प्रख्यात जैन मुनि तथा राष्ट्र संत तरुण सागर जी महाराज का आज निधन हो गया. रतलब है कि, 20 दिन पहले उन्हें पीलिया हुआ था. जिसके बाद उन्हें दिल्ली के मेक्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था लेकिन उन्होंने इलाज कराने से मना कर दिया था. जिसके बाद उन्होंने राधापुरी जैन मंदिर चातुर्मास जाने का निर्णय किया था. बताया जा रहा है कि वे संथारा प्रथा का पालन कर रहे थे और उन्होंने दवाइयां लेने से इंकार कर दिया था. जैन संप्रदाय के लोग संथारा प्रथा के तहत अन्न-जल छोड़ देते हैं, इसका लक्ष्य जीवन को ख़त्म करना होता है. जैन संप्रदाय की मान्यता के अनुसार इस तरह 'मोक्ष' प्राप्त किया जा सकता है. आज शनिवार देर रात करीब 3.30 बजे जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज ने 51 वर्ष की आयु में अपना शरीर छोड़ दिया तथा महाप्रयाण पर चले गये. जैन मुनि के निधन की खबर आने के बाद देशभर में शोक की लहर दौड़ गयी है तथा न केवल जैन समाज अपितु सर्व समाज जैन मुनि के देवलोकगमन पर शोकाकुल है तथा उन्हें अपने अपने तरीके से अंतिम विदाई दे रहा है. निश्चित रूप से जैन मुनि एक सच्चे राष्ट्र संत थे जिन्होंने अपनी शब्द अग्नि से शिराओं में बर्फ बन चुके रक्त को राष्ट्रभक्ति, सामाजिक दायित्व व धर्म अनुराग का लावा बनकर प्रवाहित कराया तथा लोगों में नई चेतना पैदा की.जैन मुनि तरुण सागर का असली नाम पवन कुमार जैन था. उनका जन्म 26 1967 को ग्राम गुहजी, जिला दमोह, राज्य मध्य प्रदेश में हुआ था. कहा जाता है कि उन्होंने 1981 में घर छोड़ दिया था. जिसके बाद उनकी शिक्षा दीक्षा छत्तीसगढ़ में हुई थी. तरुण सागर अपने कड़वे प्रवचनों के लिए प्रसिद्ध थे. इसी वजह से उन्हें क्रांतिकारी संत भी कहा जाता था. जैन मुनि पर आधारित किताब कड़वे प्रवचन एक वक्त काफी प्रख्यात हुई थी. समाज के विभिन्न वर्गों को एकजुट करके के लिए उन्होंने काफी प्रयास किए हैं. जैन मुनि तरुण सागर को मध्यप्रदेश सरकार ने 6 फरवरी 2002 को राजकीय अतिथि का दर्जा दिया था. बता दें कि, भारत ही नहीं बल्कि कई देशों में जैन-मुनि के भक्त रहते हैं. तरुण सागर जी की लोकप्रियता जैन समुदाय के बाहर भी थी. जितना सम्मान तरुण सागर जी को जैन समाज देता था उतना ही सम्मान उन्हें जैन समाज के बाहर से मिलता था. जैन मुनि के बारे में कहा जाता है कि उनके शब्दों में वो आग थी जो पूरी तरह से सुसुप्त हो चुकी इंसानी चेतना को भी क्रान्ति के धर्मपथ पर अग्रसर कर देती थी.

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