Tuesday, 27 November 2018

अब कश्मीरी पंडितों ने उठाई मांग

करीब 15 सौ साल पुरानी उस शारदा पीठ की PoK में है.70 साल बीत चुके हैं वहां किसी हिंदू को जाने की इजाज़त नहीं मिली है.

कश्मीरी पंडित अपनी कुलदेवी तक पहुंचने के लिए लड़ रहे हैं लड़ाई*
आस्था के केंद्र इस मंदिर तक पहुंचना और एक बार फिर से यहां पूजा करना कश्मीरी पंडितों की जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद बन चुका है.अपनी कुलदेवी तक पहुंचने के लिए वो एक बड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं.1947 यानी वो साल जब तक पाकिस्तान का कश्मीर के उस हिस्से पर (PoK) कब्जा नहीं था तब तक हर कश्मीरी पंडित कुलदेवी शारदा के दर्शन के लिए जाते थे. शारदा पीठ में जयकारे गूंजते थे लेकिन पाकिस्तान ने जैसे ही कश्मीर के एक हिस्से पर कब्जा किया उस मंदिर का संपर्क हिंदुओं से खत्म हो गया.हालात ये है कि अब शारदा पीठ सिर्फ नाम के लिए मंदिर है क्योंकि वो खंडहर में तब्दील हो चुका है.
क्या है शारदा पीठ का महत्व*
करीब 15 सौ साल पुरानी उस शारदा पीठ की PoK में है.70 साल बीत चुके हैं वहां किसी हिंदू को जाने की इजाज़त नहीं मिली है. अब तो वो इलाका आतंकियों के कब्जे में है.शारदा शक्तिपीठ प्राचीन काल से ही पूरे विश्व में हिंदुओं और बौद्ध धर्म के लोगों के लिए शिक्षा का एक बड़ा केंद्र रहा है.यह पीठ नीलम और मधुमति नदी के संगम पर पाकिस्तान के मुजफ्फराबाद से 130 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.आजादी के पहले अगस्त में यहां वार्षिक यात्रा आयोजित होती थी.दोनों देशों के बीच 2004 में हुए एक समझौते के तहत नियंत्रण रेखा के दोनों ओर की आबादी को आने-जाने में रियायत दी गई ताकि वह अपने रिश्तेदारों से भी मिल सके और माता के दर्शन भी कर सकें.इस दौरान सेव शारदा संगठन ने इस समझौते में शारदा पीठ की यात्रा को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा था. तभी से ये मांग उठती आ रही है.



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